अंतिम शॉट तक हार नहीं मानताः रोंजन

  • 31 अगस्त 2013
खेल

निशानेबाज़ रोंजन सोढ़ी को 'राजीव गांधी खेल रत्न' पुरस्कार के लिए चुना गया है. ये पुरस्कार उन्हें शनिवार को राष्ट्रपति भवन में एक समारोह में दिया गया.

राजीव गांधी खेल रत्न' पुरस्कार भारत का सर्वोच्च खेल पुरस्कार माना जाता है.

पहले वर्ल्ड चैंपियन और अब खेल रत्न पुरस्कार. निशानेबाज़ी में शून्य से शिखर तक पहुंचने के अपने सफर के बारे में रोंजन सोढ़ी ने बीबीसी संवाददाता दीप्ति कार्की से बातचीत की.

रोंजन सोढ़ी ने जब निशानेबाज़ी की शुरुआत की तो शुरु-शुरु में उन्हें काफ़ी बाधाएं आईं. मगर वे मानते हैं कि तब से अब चीज़ें बहुत बदल गई हैं.

वे बताते हैं कि निशानेबाज़ी के लिए पहले जो उपकरण इस्तेमाल होते थे वे भारत के नहीं, बल्कि इटली के बने होते थे.

रोंजन बताते हैं, "पहले निशानेबाज़ी के उपकरण तथा बंदूकें आसानी से उपलब्ध नहीं थीं, मगर अब ऐसा नहीं है. अब सरकार से बहुत मदद मिलती है. कई कैंप लगाए जा रहे हैं. किसी चीज़ की कमी नहीं होती."

रोंजन सोढ़ी को अब तक कई पुरस्कार मिले. खिलाड़ी को एक तरफ़ सराहना मिलती है, तो कई बार उसे आलोचनाओं का भी शिकार होना पड़ता है. जब खेल रत्न के लिए उनके नाम की सिफ़ारिश की गई तो कुछ लोगों ने इसकी आलोचना की थी.

सकारात्मक सोच ज़रूरी

रोंजन इस तरह की आलोचनाओं को गंभीरता से नहीं लेते. कृष्णा पुनिया ने भी रोंजन को यह पुरस्कार दिए जाने पर सवाल उठाए थे.

रोंजन सोढ़ी कहते हैं, "मुझे यह पुरस्कार शेयर करने में कोई दिक्क़त नहीं थी. पहले भी दो लोगों को पुरस्कार मिला है, तीन लोगों को भी मिला है. लेकिन यह फ़ैसला कमेटी का था."

रोंजन को विश्वस्तर का निशानेबाज़ माना जाता है. विश्वस्तर का निशानेबाज़ बनने के लिए कौन से गुण होने चाहिए, इस बारे में रोंजन का कहना है कि सबसे ज़रूरी है कि खिलाड़ी का सोच सकारात्मक हो. वह अंत तक हार ना माने.

भारत में निशानेबाज़ी को आम खेल नहीं माना जाता. यदि खेलों का चुनाव करना हो तो कोई बच्चा सबसे पहले क्रिकेट को ही चुनता है. इस सोच में बदलाव आ रहा है. रोंजन ने शूटिंग ही करने का फ़ैसला क्यों लिया.

रोंजन कहते हैं, "शूटिंग मैंने शौक़िया शुरू किया था. कभी सोचा नहीं था कि इसे अपना पेशा बनाऊंगा. कॉमनवेल्थ, एशियन, ओलंपिक खेलों में जब एक के बाद एक बहुत सारे मेडल मिलने लगे तो लगा कि मैं इसमें कुछ कर सकता हूं."

निशानेबाज़ी दिमाग़ का खेल है

रोंजन मानते हैं कि छोटे छोटे शहरों में शूटिंग रेंज खुलने चाहिए.

साल 2004 में रोंजन ने तय कर लिया कि अब शूटिंग को ही अपना करियर बनाना है.

एक निशानेबाज़ का जीवन काफ़ी व्यस्त होता है. रोंजन के भी सुबह से शाम तक प्रैक्टिस सेशन चलते रहते हैं. उनकी ट्रेनिंग ज्यादातर इटली में ही होती है.

रोंजन मानते हैं कि निशानेबाज़ी 80 फ़ीसदी दिमाग़ का खेल है इसलिए ज़रूरी है कि खिलाड़ी की मनोवैज्ञानिक ट्रेनिंग हो.

रोंजन को बचपन से निशानेबाज़ी का शौक़ था. खिलौने में उन्हें बंदूक़ ही पसंद था.

परिवार का साथ मिला

बचपन में जब रोंजन के माता पिता ने उनका झुकाव खेलों की ओर देखा तो उन्होंने उनसे पहले पढ़ाई पूरी करने की सलाह दी. इसलिए उन्होंने पहले पढ़ाई पूरी की. फिर एमबीए भी किया.

खेल में सफलता हासिल करने के लिए वे माता पिता का साथ ज़रूरी मानते हैं. वे बताते हैं कि एमबीए करते वक़्त वे निशानेबाज़ी का अभ्यास नहीं कर पा रहे थे.

उस समय उनके माता पिता ने आगे आकर कहा, "अगर पेशेवर तरीक़े से शूटिंग करना चाहते हो, तो बेशक नौकरी छोड़ दो. अगर माता-पिता का साथ नहीं मिलता, तो इस मुक़ाम पर पहुंचना मुश्किल होता."

वे कहते हैं, " अगर माता पिता की तरफ़ से छूट न मिले तो खेल में करियर बनाना बहुत मुश्किल है, ख़ासकर भारत में."

एमबीए निशानेबाज़

रोंजन ज्यादातर इटली में रहते हैं. वहां वे भारतीय खाना मिस करते हैं.

रोंजन सोढ़ी ने एमबीए करने के बाद एलजी कंपनी में एक महीने काम भी किया है. जब इसे छोड़ने का फ़ैसला लिया तो उन्हें काफ़ी दुविधा महसूस हुई.

वे बताते हैं, "उस समय एमबीए छोड़कर शूटिंग में आना जुआ खेलने जैसा ही था. क्या पता था कि बाद में इतने मेडल मिलेंगे. और मैं इसे करियर बना लूंगा."

रोंजनअगर निशानेबाज़ नहीं होते तो एमबीए करके कॉरपोरेट की दुनिया में कुछ अलग कर रहे होते.

शूटिंग के अलावा उनके कई शौक़ हैं. फ़िल्में देखना, म्यूज़िक सुनना, आउटडोर स्पोर्ट्स खेलना आदि. इटली में जब रोंजन ट्रेनिंग करते हैं तो वे भारतीय खानों की कमी सबसे ज्यादा महसूस करते हैं. उन्हें इंडियन फ़ूड बहुत पसंद हैं.

लंदन की ग़लतियां रिओ में सुधारनी हैं

शूटिंग के बारे में आम धारणा है कि यह कुलीन वर्ग का खेल है. रोंजन मानते हैं कि इस सोच में बदलाव लाने के लिए ज़मीनी स्तर के प्रयास करने की ज़रूरत है.

वे मानते हैं कि यह बदलाव तभी आएगा जब छोटे-छोटे शहरों में शूटिंग रेंज खुलेंगी. तब ज्यादा से ज्यादा लोगों को पता चलेगा इसके बारे में.

वे कहते हैं, "आज की तारीख़ में शूटिंग रेंज ज्यादातर बड़े शहरों में ही हैं. इसे भारत के कोने-कोने में पहुंचाने के लिए छोटे-छोटे शहरों में भी रेंज खोलने पड़ेंगे."

ओलंपिक में वे गोल्ड मेडल नहीं जीत पाए थे मगर वे कहते हैं कि लंदन में जो ग़लतियां हुई हैं, उसे रिओ में सुधारनी हैं.

क्रिकेट के अलावा दूसरे खेलों के प्रति इतना पक्षपात भरा रवैया क्यों है. देश के सबसे मशहूर खेल और सबसे कम मशहूर खेल के प्रति इतना पूर्वाग्रह क्यों है.

इस बारे में रोंजन सोढ़ी का मानना है कि पहले से बहुत फ़र्क़ आया है. जब कॉमनवेल्थ गेम दिल्ली में हुए तो बहुत लोगों को तब पता चला कि निशानेबाज़ी में क्या क्या इवेंट होते हैं, आर्चरी में क्या-क्या होता है.

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