क्यो सट्टेबाज़ी को मिले क़ानूनी मान्यता?

  • 17 मई 2013

राजस्थान रॉयल्स के तीन खिलाड़ियों की गिरफ्तारी के बाद ये बहस फिर से शुरू हो गई है कि क्या सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए? बीबीसी संवाददाता फ़ैसल मोहम्मद अली ने इस सिलसिले में क़ानून के जानकारों और अन्य लोगों से बातचीत की:

मशहूर खेल पत्रकार अयाज़ मेमन

मेरे विचार में सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दी जानी चाहिए. इससे न सिर्फ खेल में भ्रष्टाचार पर क़ाबू हो सकेगा बल्कि सरकार की आमदनी का रास्ता भी खुलेगा. फिलहाल ये सारा पैसा काले धन के तौर पर कुछ लोगों की जेबें भर रहा है.

साथ-ही-साथ खेल को लेकर भी कई तरह की अफ़वाहें उड़ती रहती हैं. लोगों का भरोसा खेल और खिलाड़ियों पर कम हो रहा है, जो न तो खेल से जुड़े संगठनों बल्कि उन खिलाड़ियों के लिए भी अच्छा नहीं है, जो इस तरह की गतिविधियों में शामिल नहीं हैं.

मैं ये बिलकुल नहीं कर रहा कि इससे फिक्सिंग ख़त्म हो जाएगी लेकिन उस पर कम से कम कंट्रोल ज़रूर हो जाएगा. जो कुछ हो रहा है वो खिलाड़ियों को कम पैसे मिलने की वजह से नहीं है. भारत में आज रणजी टूर्नामेंट के स्तर के खिलाड़ियों को भी 10 से 12 लाख रूपए सालाना मिल रहे हैं.

श्रीसंत को आईपीएल से ही दो करोड़ रूपए के क़रीब मिले हैं. ये देखा गया है कि जब भी किसी खेल में बहुत पैसा आ गया है वहां इस तरह की बातें शुरू हो गई हैं. और ये सिर्फ क्रिकेट तक ही सीमित नहीं है, फुटबॉल में कुछ साल पहले जर्मन और इटली के लीग में फिक्सिंग की बात सामने आई थी. अस्सी-नब्बे साल पहले बेसबाल की लीग को इसी मामले पर तोड़ना पड़ा. ये बॉक्सिंग में भी हुआ है.

टेनिस में कुछ साल पहले शीर्ष के दस में से एक खिलाड़ी के खिलाफ़ जांच हुई. इन खेलों से इन सभी घोटालों के कारण एक व्यवस्था स्थापित हुई जो अब इसपर काफ़ी बेहतर तरीक़े से क़ाबू रख पा रही है. अब तो तो मैच फिक्सिंग के बदले स्पॉट फिक्सिंग की जा रही है, जिसे क़ाबू करना और मुश्किल है.

उदाहरण

इस पर लगाम लगाने के लिए हमें निगरानी बढ़ानी होगी, ऐसे मामलों की तहकीक़ात बेहतर तरीक़े से करनी होगी और इसमें शामिल लोगों को जो कड़ी से कड़ी सज़ा देनी होगी, ताकि दूसरों को डर रह सके.

क्रिकेट में भी ये मौक़ा है जब यहां इन चीज़ो पर निगाह रखने के लिए व्यवस्था बनाई जानी चाहिए. पहले भी ये मौक़ा आया था, साल 2000 में जब मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया था. लेकिन मुझे लगता है तब इसे उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया.

ब्रिटेन में सलमान बट् वग़ैरह के मामले को वहां की क्रिकेट बोर्ड ने नहीं उठाया था. मीडिया ने स्टिंग ऑपरेशन किया और एक दर्शक ने ब्रितानी अदालत में मुक़दमा दायर कर दिया था कि उसने मैच के टिकट ख़रीदे थे और उसके साथ इस फिक्सिंग की वजह से धोखाधड़ी हुई है.

वहां क़ानून ऐसा है कि इस मामले पर जांच हो गई और खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लग गया और सारी कार्रवाई हुई. पिछले साल जब आईपीएल के चार-पांच खिलाड़ी ये बात करते हुए पाए गए थे कि फिक्सिंग कैसे हो सकती है तो उसी वक़्त इस पर विचार किया जाना चाहिए था.

लोग चाहें तो उस तरह की व्यवस्था से सीख ले सकते हैं जो अंतरराष्ट्रीय फ़ुटबाल फेडेरेशन ने लिया है. वहां सट्टेबाज़ी पर निगाह रखने के लिए एक निगरानी एजेंसी तैयार की गई है जो इसमें बहुत अधिक उतार चढ़ाव होने पर उसका संज्ञान लेती है.

मनोज मित्ता, क़ानून के जानकार

पहली बात मैं ये कहना चाहता हूं कि हमें स्पॉट फिक्सिंग और बेटिंग या सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दे देने से इसके ख़त्म हो जाने के अंतर को समझना होगा. क्योंकि ब्रिटेन में गैम्बलिंग और सट्टेबाज़ी क़ानूनी है लेकिन फिर भी वहां साल 2010 में क्रिकेट के खेल में स्पॉट फिक्सिंग का मामला सामने आया.

तो दोनों अलग-अलग चीज़ है. लेकिन हां जुआ या सट्टेबाज़ी को क़ानूनी मान्यता दे दी जानी चाहिए, क्योंकि ऐसा नहीं है कि इसके ग़ैर-क़ानूनी रहने से फिलहाल लोग इसमें शामिल नहीं हो रहे हैं. ये अभी चोरी-छिपे तरीक़े हो रहा है. गैम्बलिंग को इजाज़त मिलने से सरकार को इससे राजस्व भी मिलेगा. अगर आप मैच पर सट्टा लगाने की इज़ाज़त देंगे तो स्पॉट फिक्सिंग में कमी आएगी.

जुआ या सट्टेबाज़ी पर जो बहस है वो हमारे यहां क्रिकेट में ये मामला सामने आने के पहले से चल रहा है, हमारे यहां 19वीं सदी का क़ानून है जो अभी भी चल रहा है. उसी के आधार पर हमारे यहां जुआख़ाने नहीं है, उस मामले में उन्होंने एक ही अपवाद छोड़ा है वो घुड़दौड़ को लेकर है.

ये भी एक तरह का पाखंड है क्योंकि घुड़दौड़ जुआ नहीं है तो क्या है? हमारे समाज में जुए को लेकर जो पूर्वाग्रह है उसे ख़त्म करना होगा. हमारे पास पुराने उदाहरण हैं महाभारत में जुआ खेलने का ज़िक्र है. गुजरात में शराबबंदी है. उसका नतीजा क्या है, वहां शराब की तस्करी हो रही है, लोगों ने पीनी थोड़ी ही छोड़ दी है.

केटीएस तुलसी, वकील

क़ानूनी मान्यता दिए जाने से बाक़ी बातों के अलावा जुर्म में भी कमी आएगी. मुंबई का मामला ही ले लें, जहां किसी ने सट्टे में लाखों गँवाए और बाद में फिरौती के चक्कर में एक बच्चे का क़त्ल कर दिया.

क़ानूनी मान्यता मिलने के बाद जो इस काम में लगे होंगे उन्हें लाइसेंस लेना होगा, सारा लेन-देन बैंक के माध्यम से करना ज़रूरी होगा, इससे पारदर्शिता आएगी.

कुछ लोग जो ये कहते हैं कि इससे ग़रीब बर्बाद हो जाएंगे या कुछ लोग अपना घर बार इसी के पीछे लगा देंगे तो वो तर्क सही नहीं है. शराब जहां बंद है वहां लोग शराब नहीं पी रहे, बल्कि अक्सर ज़हरीली शराब पीकर मर जाते हैं.

हमें सिर्फ नैतिकता की बात करने की बजाए चीज़ों को व्यवहारिक तौर पर देखने की आदत डालनी चाहिए.

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