भारतीय ओलंपिक संघ पर लटकी तलवार, फ़ैसला आज

  • 4 दिसंबर 2012
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी)

इन दिनों भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) चर्चा में हैं क्योंकि खबर है कि अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) उसके विरुद्ध कार्रवाई कर सकती हैं और 4-5 दिसंबर को होने वाली बैठक में उसे निलंबित करने का प्रस्ताव रख सकती है.

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का आरोप है कि भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के चुनावों में गत दो वर्षों से भारत सरकार का हस्तक्षेप रहा है.

इस स्थिति से निबटने के लिए आईओए अपने दो प्रतिनिधियों को आईओसी के स्विटज़रलैंड स्थित मुख्यालय लुज़ान भेज रही हैं.

आईओए के नवनिर्वाचित अध्यक्ष अभय चौटाला ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि आईओए के निलंबन संबंधी तमाम ख़बरें केवल अफ़वाहें है.

आईओसी का क्या कहना है

अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति (आईओसी) ने सोमवार को भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) को लिखिति में सूचित किया कि वो मौजूदा स्थिति में सुधार नहीं होने की दशा में 4-5 दिसम्बर को होने वाली अपने कार्यकारी बोर्ड की बैठक में आईओए को निलंबित करने का प्रस्ताव रखेगी.

आईओसी का कहना है कि वह दो वर्ष से अधिक समय से, आईओए की चुनाव प्रक्रिया में सरकार के दखल के बारे में गहरी चिंता जताता रहा है.

आईओसी ने आईओए के हालिया चुनाव उसके संवैधानिक दिशा-निर्देशों और ओलंपिक चार्टर की बजाए सरकारी नियमों के हिसाब से होने की खबरों पर भी चिंता जताई है.

आईओसी ने चेतावनी दी है कि वह इस दशा में आईओए के चुनाव नतीजों को मान्यता नहीं देगा. आईओसी का ये भी कहना है कि वह अपने इस रूख से सम्बद्ध पक्षों को पहले ही अवगत करा चुका है, लेकिन आईओए इन लंबित मुद्दों का समाधान संतोषजनक तरीके से नहीं कर सका.

आईओसी का कहना है कि आईओए ने उसके साथ सूचनाओं का आदान-प्रदान भी नहीं किया, इन तमाम कारणों से आईओए पर निलंबन का खतरा मंडरा रहा है जिसके बारे में आईओसी की कार्यकारी बोर्ड की बैठक में विचार-विमर्श किया जाएगा.

आईओए का क्या कहना है

इस स्थिति से निबटने के लिए आईओए अपने दो प्रतिनिधियों को आईओसी के स्विटज़रलैंड स्थित मुख्यालय लुज़ान भेज रही हैं जो चार और पांच दिसंबर को वहां अपनी बात रखेंगें.

इनमें हॉकी इंडिया के महासचिव नरेंद्र बत्रा और झारखंड ओलंपिक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी वकील आर के आनंद शामिल हैं.

दरअसल इससे पहले आईओसी ने फैसला किया था कि अगर आईओए के चुनाव सरकार की खेल संहिता के मुताबिक होते हैं तो उसकी मान्यता रद्द करने का प्रस्ताव पेश किया जाएगा.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि निलंबन की स्थिति में पांच दिसंबर को होने वाले आईओए के चुनावों का क्या होगा.

वैसे तो बीते शुक्रवार को विपक्ष में कोई भी उम्मीदवार ना होने से अभय सिंह चौटाला निर्विरोध आईओए के अध्यक्ष चुन लिए गए थे.

उनके अलावा राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार मामले में पिछला लगभग एक साल जेल में बिताने वाले ललित भनोट महासचिव, वीरेंद्र नानावटी वरिष्ठ उपाध्यक्ष और एन रामाचंद्रन कोषाध्यक्ष चुन लिए गए. आईओए के बाकी पदाधिकारियों का चुनाव पांच दिसंबर को होगा.

अभय चौटाला की राय

Image caption निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा कई बार आईओए को निशाना बनाते रहे हैं.

आईओए के नवनिर्वाचित अध्यक्ष ने बीबीसी से बातचीत में बताया कि आईओए के निलंबन संबंधी तमाम ख़बरें केवल अफ़वाहें है.

उन्होंने कहा, ''ये चुनाव आईओसी के चार्टर, आईओए के संविधान और सरकार के दिशा-निर्देशो के अनुसार हुए है. ये चुनाव कोर्ट के उस निर्देश के अनुसार भी हुए है जिसमें उपरोक्त तीनों बाते हैं. ये चुनाव एक कमीशन की देखरेख में हुआ जिसमें दो रिटायर्ड चीफ जस्टिस और एक रिटायर्ड जस्टिस शामिल हैं.''

अभय चौटाला ने ये भी कहा कि उनके विरोधियों के पास चुनाव जीतने लायक समर्थन नही था इसलिए उन्होंने अपना नाम वापस ले लिया, जिससे वह निर्विरोध चुनाव जीत गए.

जब चौटाला से अतंरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के सदस्य रणधीर सिंह के विरोध की बात चली तो उन्होंने कहा, ''अब रणधीर सिंह आईओए की किसी भी संस्था के सदस्य नही हैं और ना ही वह अन्य किसी रूप में उससे जुडे हैं, जबकि आईओसी का सदस्य बनने के लिए किसी भी देश की ओलंपिक संस्था का सदस्य होना आवश्यक है. अब या तो आईओसी उनकी सदस्यता ख़ुद समाप्त कर देगी, अन्यथा इसके लिए हम कहेंगें.''

राष्ट्रमंडल खेलों में भ्रष्टाचार से जुडे मामलों में ललित भनोट का नाम शामिल होने की बात पर चौटाला भनोट का बचाव करते हुए कहते है, ''जब तक भारत में किसी व्यक्ति को कोर्ट दोषी नही ठहराता है, तब तक वह चुनाव लड़ने की योग्यता रखता हैं.''

जानकारों का मत

इसके ठीक विपरीत भारत के पूर्व ओलंपियन अशोक ध्यानचंद मानते हैं कि खेलों में सर्वोच्च संस्था से जुड़े पदाधिकारियों की छवि का साफ़-सुथरा होना आवश्यक है.

वही जाने माने खेल पत्रकार राजेश राय राजनीतिज्ञों और पदाधिकारियों के पद से चिपके रहने का कारण ये बताते है कि अगर पदाधिकारी राजनीति से जुड़ा है तो सरकारी अनुदान आसानी से मिल जाता है.

वे कहते हैं कि ओलंपिक जैसे बड़े खेल मेले में भी संघ का पदाधिकारी होने के नाते आसानी से प्रवेश मिल जाता है जो पदों को छोडने का मोह त्यागने नही देता.

इसके अलावा राजेश राय ये भी कहते है कि सरकार ने जब उम्र संबंधी क़ानून लाना चाहा तो उसका सबसे ज्यादा विरोध बीसीसीआई ने किया जिसमें अधिकांश पदाधिकारी राजनेता ही हैं, यहां तक कि उन्होंने आरटीआई का भी विरोध किया.

उनका ये भी कहना है कि जब सरकार करोड़ों रूपया ओलंपिक और राष्ट्रमंडल जैसे खेलों पर खर्च करती है तो उसका हिसाब-किताब खेल संघों से क्यों ना मांगे.

अब जब कोई भी संघ जबावदेही नहीं चाहता तो ऐसे में यह देखना दिलचस्प है कि भारतीय ओलंपिक संघ और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के बीच आने वाले 2-3 दिनों में क्या कुछ होता है.

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