गिरीशा ने जीता भारत का पहला पैरालिंपिक मेडल

 मंगलवार, 4 सितंबर, 2012 को 15:33 IST तक के समाचार

कर्नाटक के रहने वाले गिरीशा के घर में उत्सव जैसा माहौल है.

लंदन में चल रहे पैरालिंपिक खेलों में गिरीशा होसानगरा ने भारत के लिए ऊँची छलांग के इवेंट में रजत पदक जीता है और खेलों में देश का खाता खोला है.

गिरीशा होसानगरा नागाराजेगाउडा के गाँव वसनगरा में खुशी की लहर दौड़ गई है. वसनगरा कर्नाटक राज्य के जिला हासन में है.

पैरालिंपक खेल शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के लिए आयोजित किए जाते हैं.

24-वर्षीय गिरीशा ने पुरुषों की ऊँची छलांग में 1.74 मीटर की छलांग लगाकर ये पदक जीता है.

प्रतियोगिता में फिजी के इलीइसा डेलाना ने स्वर्ण और पोलैंड के लुकाज मामकार्ज़ ने कांस्य पदक जीता.

परिवार मना रहा है खुशियां

पैरालिंपक खलों में भारत के लिए मिस्टर पेटकर ने पहला मेडल 1972 में जीता था. उसके बाद 1984 में जोगिंदर सिंह बेदी ने दो मेडल जीते. ये सभी मेडल एथलेटिक्स में आए थे.

वर्ष 2004 में एथेंस पैरालिंपिक खेलों में देवेंद्र झाझरिया ने एथलेटिक्स में ही स्वर्ण (विश्व रेकॉर्ड) और राजिंदर सिंह राहेलू ने पावर लिफ्टिंग में कांस्य पदक जीता था.

"गरीबी की वजह से गिरीशा पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए. फिर वो बंगलौर आ गए. धीरे-धीरे उन्होंने राज्य स्तरीय खेलों में भाग लेना शुरू किया जहाँ पर हमने उनकी पहचान की"

गैरसरकारी संगठन के नागेश

बाएँ पाँव से अक्षम गिरीशा के भाई शंकर से जब बीबीसी ने बात की तो उन्होंने टूटी फूटी हिंदी और अंग्रेजी में बहुत खुश होते हुए कहा, “फुल एंटरटेनमेंट. एंजॉइंग,” यानि इस खबर से परिवार बेहद खुश है, और फिर अपनी खुशियों को वो कन्नड़ में बयान करने लगे.

फिर आगे उन्होंने कहा, “दिस इज इंडिया मेडल. दिस इज टोटल इंडिया फेस्टिवल” यानि ये भारत का मेडल है और एक किसी भारतीय त्योहार जैसा है.

पिता नागराजेगाउडा और जयम्मा भी अपने बेटे की इस कारनामे से बेहद खुश हैं और घर में किसी उत्सव जैसा माहौल है.

शंकर ने बताया कि उन्होंने लंदन में अपने भाई को फोन करके बधाई दे दी है.

लंदन में गिरीशा का हमसे संपर्क नहीं हो पाया है.

बेहदल गरीबी में पले-बढ़े

शंकर ने बताया कि उनका परिवार बेहद गरीब है और खेती से जुड़ा है.

गिरीशा को बैंगलोर के गैर-सरकारी संगठन समर्थनम का सहयोग प्राप्त है जो विकलांग लोगों की सहायता करती है.

समर्थनम से जुड़े एसपी नागेश ने बीबीसी को बताया कि गिरीशा ने 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई की है और वो अभी बैंगलोर में आईएनजी वैश्य बैंक में काम करते हैं.

नागेश कहते हैं, “गरीबी की वजह से गिरीशा पढ़ाई पूरी नहीं कर पाए. फिर वो बंगलौर आ गए. धीरे-धीरे उन्होंने राज्य स्तरीय खेलों में भाग लेना शुरू किया जहाँ पर हमने उनकी पहचान की.”

नागेश ने बताया कि पिछले दो महीनों में गिरीशा जर्मनी भी गए जहाँ उन्होंने पद जीते.

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