पाकिस्तान: रिमशा पर आरोप लगाने वाले इमाम बरी

  • 18 अगस्त 2013
गिरफ़्तार किए गए इमाम

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद की एक ज़िला अदालत ने ईसाई बच्ची पर ईश-निंदा का आरोप लगाने वाले मस्जिद के इमाम को बरी कर दिया है.

अदालत ने कहा कि मुलज़िम ख़ालिद जदून के ख़िलाफ़ ऐसा कोई सबूत नहीं मिला है जिसके आधार पर मुक़दमे को आगे चलाया जा सके.

ख़ालिद जदून ने 14 वर्षीय रिमशा मसीह पर कथित तौर पर मुसलमानों की धार्मिक पुस्तक क़ुरान के पन्नों को जलाने का आरोप लगाया था.

इमाम के आरोप लगाने के बाद रिमशा मलिक को कई हफ़्ते जेल में बिताने पड़े थे और रिहा होने के बाद वे अपने परिवार के साथ कनाडा चली गईं.

लेकिन बाद में इमाम पर ही रिमशा को फँसाने का मुक़दमा चलाया गया था.

इस मामले में ख़ालिद जदून को औपचारिक रूप से अभियुक्त नहीं बनाया गया था. अब गवाहों द्वारा उनके ख़िलाफ़ आरोप वापस लिए जाने के बाद उन्हें बरी कर दिया गया है.

ऐसा दावा किया गया था कि उन्होंने रिमशा के बैग में क़ुरान के पन्ने और राख रख दी थी.

रिमशा का परिवार पाकिस्तान छोड़कर कनाडा चला गया है

जदून के वकील ने बीबीसी उर्दू को बताया कि अदालत ने उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा न चलाने की दलील को स्वीकार कर लिया.

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धमकियाँ

ग़ौरतलब है कि पिछले साल रिमशा को पाकिस्तान के ईसाई इलाक़े से स्थानीय लोगों के प्रदर्शनों के बाद गिरफ़्तार किया गया था. इस्लामाबाद के एक व्यापारी के कहने पर स्थानीय पुलिस ने साल 2012 में रिमशा पर ईश-निंदा का मुक़दमा दर्ज किया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था.

लेकिन सेशन कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ कोई सुबूत न होने के कारण उन्हें सितंबर 2012 में बरी कर दिया था.

रिमशा के जेल से रिहा होने के बाद उनके परिवार को जान से मारने की धमकियाँ मिली थी. इस वजह से पुलिस ने परिवार को किसी अंजान जगह पर रख दिया था. बाद में रिमशा और उनका परिवार कनाडा चला गया था.

इस मामले के बाद पाकिस्तान के कड़े ईश-निंदा क़ानूनों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के हालातों पर अंतरराष्ट्रीय बहस हुई थी.

पाकिस्तान के ईसाई समुदाय ने रिमशा की गिरफ़्तारी के ख़िलाफ़ प्रदर्शन किए थे

एक साल पहले इस मामले को लेकर इस्लामाबाद के नोही इलाक़े में कुछ लोगों ने ईसाइयों से रिश्ता रखने वाले लोगों के घरों को नुक़सान भी पहुँचाया था. इन घटनाओं के बाद स्थानीय ईसाई समुदाय के लोगों को सुरक्षित स्थानों पर शरण लेनी पड़ी थी. उस वक़्त प्रशासन ने बताया था कि छह सौ परिवार इस इलाक़े को छोड़कर अपने रिश्तेदारों के यहाँ चले गए थे.

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कठोर क़ानून

ज्ञात हो कि पाकिस्तान के तौहीन-मज़हब (ईश-निदा) क़ानून की धारा 295 के तहत रिमशा के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज किया गया था. रिमशा के मामले में पहली बार इस क़ानून के तहत गिरफ़्तार किए गए किसी व्यक्ति को ज़मानत दी गई थी. जुर्म साबित होने की स्थिति में उन्हें उम्र कैद की सजा हो सकती थी.

उस वक्त पाकिस्तानी उलेमाओं के समूह अल पाकिस्तान उलेमा कौंसिल ने ईसाई लड़की की तरफ़दारी करते हुए कहा था कि ये मामला पाकिस्तान के लिए एक टेस्ट केस है और इसमें किसी क़िस्म की नाइंसाफ़ी नहीं होनी चाहिए.

साथ ही उस वक़्त ईसाई समुदाय ने मुक़दमे के ख़िलाफ़ और रिमशा की रिहाई के लिए कई प्रदर्शन भी किए थे.

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