चीनी मज़दूरों के बिना जापान का काम नहीं चलता

  • 18 अगस्त 2013
जापान

जापान और चीन की न सिर्फ़ एक दूसरे से बोलचाल बंद है बल्कि दोनों एक दूसरे के ख़िलाफ़ ख़ूब बयानाज़ी भी कर रहे हैं.

चीन सागर के दोनों और बसे मुल्कों में राष्ट्रवाद की भावना तेज़ होती जा रही है.

लेकिन दूसरे मामलों में जापान और चीन साथ-साथ हैं. सच तो ये हैं कि दोनो एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते.

जापान में रहने वाले अल्पसंख्यकों में चीनी मूल के लोगों की तादाद सबसे अधिक है. जापान में ऐसे बहुत सारे उद्योग हैं जो चीनी मज़दूरों के बिना चल ही नहीं सकते.

टोक्यो से दो घंटे की दूरी पर उत्तर में बसा है इबाराकी. इसे जापान का 'वेजीटेबल गार्डन' कहा जा जाता है. यहां की ज़मीन बहुत उपजाऊ है. यहां के ज़्यादातर कामगारों का ताल्लुक़ चीन से है.

इस फ़ार्म के मालिक का नाम योशिनोरि किताजिमा है. 50 साल के किताजिमा दुबले पतले हैं और खेत मे सालों काम करने की वजह से उनकी चमड़ी तांबई हो गई है.

चीनी कामगार

जापान में अभी ऐस 700,000से ज्यादा चीनी लोग रह रहे हैं. ये जापान को ही अपना घर मानते हैं.

दस साल पहले तक किताजिमा चीन और वहां के लोगों के बारे में बहुत कम जानते थे.

फिर उन्होंने युवा चीनियों को अपने खेतों में काम पर रखना शुरू किया. इसके बाद चीन को लेकर उनके नज़रिए में बड़ा बदलाव आया.

किताजिमा बताते हैं, “मेरा ज्यादातर वक़्त काम सीख रहे इन लोगो के साथ ही बीतता है. ये खरे और सच्चे लोग हैं. इन्हें देखकर जापान की पिछली पीढ़ी याद आती है. इन लोगों में एकजुट होकर काम करने की भावना है. यह भावना अब जापानियों में ख़त्म हो चुकी है.”

किताजिमा इन्हें ‘काम सीखने वाला’ बुलाते हैं क्योंकि ये लोग यहां काम सीखने की ग़रज से ही आए है.

खेती में लगे ज़्यादातर जापानी बूढ़े

जापान में ऐसा नियम है कि चीन से आए कामगार यहां ज़्यादा से ज़्य़ादा तीन साल ही रह सकते हैं.

लेकिन सच तो ये है कि किताजिमा के फ़ार्म पर अब इन चीनी कामगारों के बिना काम नहीं चलता.

जापान के देहाती इलाक़ों में खेती में लगे ज़्यादातर लोग बूढ़े हो चुके हैं. जापानी किसान की औसत उम्र फ़िलहाल 65 साल है.

ऐसा माना जा रहा है कि यदि जापान में खेती में जवान लोग शामिल नहीं हुए तो खेती यहां समाप्त हो जाएगी.

इसलिए बड़ी ख़ामोशी से जापान चीन की ओर रूख़ कर रहा है. किताजिमा के खेत पर जो छह युवा काम कर रहे हैं वे उन एक लाख चीनियों में से हैं जो जापान के खेतों और कारख़ानों में काम करने के लिए यहां आए हैं.

सांस्कृतिक आदान-प्रदान ज़रूरी

जापानी फार्म मालिक योशीनोर किताजिमा चीनी खेत मजदूरों को बहुत पसंद करते हैं.

जापान और चीन के बिखर रहे रिश्ते के बारे में चीनी जवान वू शाओहुआ बताते हैं, “हमारे परिवार वालों ने ये सब टीवी पर देखा. वे बहुत डर गए थे. उन्हें ऐसा लग रहा था कि यह बहुत गंभीर मामला है. लेकिन यहां जापान में इसका कोई असर नहीं हुआ. ये मुल्कों के बीच की राजनीति है. इसका असर लोगों पर बहुत कम हुआ.”

जब दोनों मुल्कों की सरकार एक दूसरे पर चीख़ चिल्ला रही है, किताजिमा की पत्नी अपने पुराने कामगार के बच्चे की ख़ैरियत जानना चाहती हैं.

किताजिमा कहते हैं, “यहां कई लोग उन शहरों से हैं जो जापानियों से नफ़रत करते हैं. लेकिन मुझे उम्मीद है कि जब वे अपने घर जाएंगे तो बताएंगे कि जापानी कैसे लोग हैं. यह भले एक छोटा सांस्कृतिक आदान प्रदान है, लेकिन बहुत अहम है.”

इस तरह के सांस्कृत्तिक आदान प्रदान आर्थिक क्षेत्र के लिए भी बहुत अहम है. किताजिमा और उन जैसे लाखों जापानी किसानों को इस बात का अहसास है कि जब जापान की जनसंख्या में बूढ़े लोगों की तादाद तेज़ी से बढ़ रही है तो उन्हें अपने पड़ोसी चीनियों की ज़रूरत पहले से कहीं ज़्यादा है.

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