गोरखालैंड आंदोलन: दो बहनों की दास्तां

  • 7 अगस्त 2013
गोरखालैंड
Image caption इस परिवार को 25 साल पहले दार्जिलिंग में हिंसा और अराजकता के दौरान काफी कुछ झेलना पड़ा था.

चाय के बागानों के लिए मशहूर दार्जीलिंग अब से 25 साल पहले ही हिंसा और अशांति का केंद्र बन गया था.

1980 के दशक में दार्जीलिंग में बसे नेपाली भाषी लोगों ने अलग राज्य के लिए अभियान चलाया. उन्होंने उस राज्य को ‘गोरखालैंड’ का नाम दिया.

फिर क्या था, दार्जीलिंग में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़क उठी.

अगस्त, 1988 में हिंसा को खत्म करने के लिए एक समझौता हुआ. उस समय क्या हुआ था, यह जानने के लिए बीबीसी संवाददाता ने उस इलाके की दो बहनों से बात की.

इन दोनों बहनों, शारदा मुखिया और प्रतिष्ठा प्रधान के परिवार को इस दशक के दौरान यहां फैली हिंसा और अराजकता के दौरान काफी कुछ झेलना पड़ा था.

1980 का दशक लगभग समाप्त हो रहा था. उत्तर भारत के दो शांत और स्थिर शहर लड़ाई का मैदान बन गए थे.

नेपाल की सरहद के करीब हिमालय की तराई में बसा है दार्जीलिंग और कलिमपोंग शहर. यहां की आजीविका का साधन मूल रूप से चाय और पर्यटन था. मगर अब यहां आने वालों में केवल पुलिस और पत्रकार ही बचे.

कभी कर्फ्यू का नाम नहीं सुना था

शारदा मुखिया बताती हैं कि शुरू-शुरू में कलिमपोंग बहुत ही शांत इलाका था. यहां के लोगों ने कभी कर्फ्यू का नाम भी नहीं सुना था. और जब कलिमपोंग में पहली बार कर्फ्यू लगा तब कलिमपोंग के गांवों से झुंड के झुंड लोग कर्फ्यू को देखने के लिए आते थे.

1986-88 के बीच दो सालों में कर्फ्यू और हड़ताल आम जनजीवन का हिस्सा बन गए थे.

शारदा मुखिया और उनका परिवार कलिमपोंग में कई पीढ़ियों से रह रहा है. पहाड़ों में रहने वाले अधिकांश परिवारों की ही तरह उनका परिवार भी मूल रूप से नेपाल से था. नेपाल से बहुत लोग चाय बागानों में काम करने के लिए आए थे.

तब वह इलाका ब्रितानियों के अधीन था. अब यह पश्चिम बंगाल का हिस्सा था. लेकिन कुछ लोगों को यह पसंद नहीं था.

शारदा मुखिया के अनुसार बंगाल के बाकी हिस्सों से यहां के लोग हर तरह से अलग थे. शायद ऐसा इसलिए था कि यहां के लोग सोचते थे कि उनकी अपनी सरकार हो.

शारदा ने बताया, "बेशक, जीवन बदला था. सब कुछ अनिश्चित था. दूसरे इलाकों से यहां के लोगों की सोच एकदम अलग थी. हम नहीं जानते थे कि कब क्या होगा. अचानक हड़ताल हो जाती थी. दफ्तर, बैंक, स्कूल बंद कर दिए जाते थे. सड़क पर एक भी वाहन नहीं होता था. पानी की किल्लत से लोग परेशान हो उठते थे. सच, जीवन काफी तेजी से बदल रहा था."

विदेशियों जैसा बर्ताव

Image caption दार्जिलिंग का वह हिस्सा, जो गोरखालैंड अभियान की भूमि है.

यह हड़ताल गोरखा राष्ट्रीय जनमुक्ति मोर्चा (जीएनएलएफ) की ओर से आयोजित होती थी.

गोरखा राष्ट्रीय जनमुक्ति मोर्चा की मांग थी अर्धशासित प्रदेश. उन्होंने इसका नाम ‘गोरखालैंड’ रखा था. वे अपनी इस मांग की ओर सबका ध्यान खींचना चाहते थे.

प्रदेश का नाम ‘गोरखा’ नाम इसलिए रखा गया था कि यह समुदाय भारतीय पहचान से खुद को जोड़ सके. साथ ही, भारतीय सेना में गोरखा जवानों की ओर ध्यान दिलाना भी एक मकसद था.

गोरखा शुबासिकी सिंह बताते हैं, "हमारे साथ विदेशियों जैसा बर्ताव किया जाता था. हम गोरखालैंड के नाम से अलग राज्य चाहते थे. हम किसी संप्रभुता संपन्न देश की मांग नहीं कर रहे थे. क्योंकि, हम भारत में ही बने रहना चाहते थे."

मगर सभी गोरखालैंड के पक्ष में नहीं थे. सत्ता संघर्ष शुरु हो चुका था.

जीएनएलएफ समर्थक और पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही स्थानीय कम्युनिस्ट पार्टी के बीच टकराव होने लगे. युवक घरों में प्रेशर कुकर की मदद से बने बम और राइफलों से हमले करने लगे थे. ऐसे में जल्द ही दंगा नियंत्रण करने वाली पुलिस, सीआरपीएफ को बुलाया गया.

'हर नेपाली चरमपंथी मान लिया जाता'

सीआरपीएफ की ओर से यहां शांति बहाल करने के उद्देश्य से उठाया गया यह कदम और खतरनाक साबित हुआ. सीएआरपीएफ के आने से इलाके में तनाव और बढ़ गया.

शारदा मुखिया बताती हैं, "जहां कहीं भी कोई नेपाली युवक मिलता उसे चरमपंथी मान लिया जाता. और फिर उसे बिना कोई कारण बताए गिरफ्तार कर लिया जाता. कई तरह यातनाएं दी जातीं. सीआरपीएफ के जवान बेधड़क किसी के भी घर में घुस जाते. तलाशी के बहाने कभी भी, कहीं ही लूटपाट करते."

वे आगे कहती हैं, "लोग पुलिस की इन ज़्यादतियों के कारण दहशत में थे. हमारे मोहल्ले के ज्यादातर मर्द घर छोड़ कर जा चुके थे. मगर हमें पता था कि हम बेगुनाह हैं. हमारे पास किसी तरह के हथियार नहीं थे. हम जानते थें कि हम देशद्रोह जैसा कुछ भी नहीं कर सकते".

अंततः फरवरी 1988 में जीएनएलएफ ने अपना पक्ष स्पष्ट किया. उनकी हड़ताल 40 दिनों की तक चली.

और ज्यादा मुश्किलों के आने की आशंका से शारदा मुखिया ने नेपाल जाने का फैसला लिया.

दहशत और आतंक का वह दिन

Image caption पुलिस और गोरखालैंड राष्ट्रीय जनमुक्ति मोर्चा के कार्यकर्ताओं के बीच काफी झड़पें हुईं.

वो 25 फरवरी की सुबह थी. शारदा काम पर निकली. उनके पीछे घर पर उनके बच्चे, पति और बहन प्रतिष्ठा ही रह गए थे.

उस दिन के बारे में प्रतिष्ठा प्रधान बताती हैं, "घर के बाहर मेरे बहनोई काम कर रहे थे. उन्हें उसी दिन बाहर निकलना था. मेरी भतीजियां घरेलू काम-काज निपटाने में लगी हुई थीं. तभी मेरे बहनोई लगभग दौड़ते हुए घर के भीतर आए और कहा- दरवाज़ा बंद करो, जल्दी. सीआरपीएफ के लोग आए हैं."

प्रतिष्ठा तब मात्र 17 साल की थीं. प्रतिष्ठा ने आगे कहा, "और हम सब एकदम सकते में आ गए. सूझ नहीं रहा था कि क्या करें. तभी बाहर खड़े सीआरपीएफ ने गोली चलाई. और मेरे बहनोई को बाहर आने को कहा. मेरे बहनोई सामने के बंद दरवाज़े की बजाए पीछे के दरवाज़े से भीतर आए थे. मैंने भागकर पीछे का दरवाज़ा बंद किया. दरवाज़ा बंद करके जैसे ही मैं फिर से रसोई घर की ओर मुड़ी, वे मेरे सामने खड़े थे."

'चरमपंथी' बताकर मार डाला

वे बताती हैं, " उन्होंने मुझे पीछे धकेला और बाहर निकल गए. बाहर निकलते ही झट से बाहर से दरवाज़ा बंद कर दिया. और तभी गोली चलने की दूसरी आवाज सुनाई दी. जोरदार धमाका हुआ और वे जमीन पर गिर पड़े. हम बाहर नहीं जा सकते थे. दरवाज़ा बंद था. मगर जब खिड़की से देखा तो पाया कि भारी संख्या में सीआरपीएफ के अधिकारी हमारे घर को घेरे खड़े हैं. उनके मुताबिक मेरे बहनोई चरमपंथी थे."

प्रतिष्ठा आगे बताती हैं कि कुछ देर बाद किसी पड़ोसी ने आकर बाहर से दरवाज़ा खोला. वे लोग बाहर निकले. और स्तब्ध रह गए.

वे बताती हैं, "मेरे बहनोई ज़मीन पर पड़े हुए थे. मेरा दिमाग बिलकुल काम नहीं कर रहा था. हमें लगा कि वे मरने का केवल अभिनय कर रहे हैं, हमारी जान बचाने के लिए. मैं उनके नज़दीक गई. मैंने पुकारा, भिनाजु (बहनोई). मैंने कहा कि लगता है कि वे लोग जा चुके हैं, चलो उठो. उन्होंने मेरा हाथ कस कर पकड़ लिया. मेरी दूसरे नंबर की भतीजी उनके लिए पानी लाने भीतर दौड़ी. हमने उन्हें पानी दिया. उन्होंने बस एक घूंट पानी लिया, एक चम्मच भर. मुझे अपने हाथ पर उनकी पकड़ मज़बूत अचानक बहुत तेज़ होती महसूस हुई, और फिर... वे जा चुके थे. "

Image caption 1986-88 के बीच दो सालों में कर्फ्यू और हड़ताल आम जनजीवन का हिस्सा बन गए थे.

प्रतिष्ठा की आवाज भारी होती जा रही थी. मानों गले में कुछ अटक गया हो.

उस पल को वे याद करती हुई बताती हैं, "सीआरपीएफ की वे आवाजें मेरे कानों में आज भी गूंजती हैं. मैं उनकी गंध अब भी पहचान सकती हूं. वो भद्दी महक. और उनकी लाल-लाल, जलती हुई आंखें. बंदूक लिए खड़े थे वे हमारे चारों ओर. उनका इरादा तो हम पर भी गोलियां बरसाने का था. मगर पता नहीं क्यों उन्होंने ऐसा नहीं किया. वे आपस में फुसफुसाए, चलो, चलो. फिर मेरे बहनोई को वहीं छोड़ चले गए. अचानक मैंने अपने तलवे के नीचे कुछ महसूस किया. वहां खून था. हां, तभी. तभी मुझे समझ में आ गया कि वे अब इस दुनिया में नहीं रहे."

इधर शारदा मुखिया, जो काम पर निकली हुई थीं, को लोगों ने बताया कि उनके घर पर गोलियां चल रही हैं. वे सीधा अस्पताल पहुंचीं.

'सीआरपीएफ का कोई हाथ नहीं है'

शारदा मुखिया बताती हैं, "मुझे याद है तब मैं पागलों की तरह दौड़ रही थी. जब मैं अस्पताल पहुंची तो लोगों ने मुझे बताया कि वे ऑपरेशन थिएटर में हैं. मुझे बताया गया कि वहां उनके शरीर से गोली निकालने की कोशिश हो रही है. किसी को भी मुझे उनकी मौत की खबर देने की हिम्मत नहीं हुई. फिर मैं अंदर गई, उन्हें देखा."

शारदा कहती हैं कि वैसे तो उस हादसे को गुज़रे 25 साल हो चुके हैं मगर आज भी वह सब याद करना उन्हें बेहद पीड़ा देता है. उन्हें ऐसा महसूस होता है कि जैसे सब कुछ कल ही हुआ हो.

शारदा मुखिया ने पति की मौत की जांच की मांग की. सीआरपीएफ की ओर से एक जांच दल कलिमपोंग भेजा गया.

अगस्त में उन्होंने शारदा को एक रिपोर्ट भेजी. उसमें कहा गया था, “हम आपके पति की अचानक मृत्यु पर अपनी गहरी संवेदना प्रकट करते हैं. हमें दुख है कि आपके परिवार को सदमे से गुजरना पड़ा. साक्ष्यों की गहन जांच-पड़ताल के बाद हमारे जांच दल ने पाया कि आपके घर पर हुई गोलीबारी की उस घटना में सीआरपीएफ का कोई हाथ नहीं है.”

पहाड़ में बहुत से लोग अब भी अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन कर रहे हैं. शारदा मुखिया और उनकी बहन प्रतिष्ठा प्रधान आज भी कलिमपोंग में रह रही हैं.

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