सुधारवादी राष्ट्रपति से 'तानाशाह' तक

  • 28 अगस्त 2013
बशर अल असद
असद का राजनीति में आना एक संयोग ही था

बशर अल असद ने वर्ष 2000 में अपने पिता हाफेज अल असद की मौत के बाद सीरिया में सत्ता की बागडोर संभाली.

शुरू में उन्होंने खुद को सुधारवादी राष्ट्रपति के तौर पर पेश किया. सैकड़ों राजनीतिक बंदी रिहा किए गए, आलोचकों को खुल कर अपनी बात कहने का मौका दिया गया और मीडिया पर लगी बंदिशों में ढील देने के लिए कदम उठाए गए.

लेकिन बाद में सुधारों की रफ्तार सुस्त पड़ गई. सीरिया में लोकतांत्रिक शासन की आस लगा रहे लोगों को निराशा हाथ लगी और देश में उदारवादी 'तानाशाही व्यवस्था' कायम हो गई.

और जब ट्यूनीशिया और मिस्र में हुई क्रांतियों से प्रेरणा लेते हुए मार्च 2011 में सीरिया में भी लोग सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरने शुरू हुए तो सरकार ने विद्रोह को कुचलने के आदेश दिए.

लेकिन सीरिया के सुरक्षा बलों के बर्बर दमन के बावजूद विद्रोह नहीं थमा.

संयोग से मिली सत्ता

11 सितंबर 1965 को जन्म लेने वाले असद अपने पिता के दूसरे बेटे हैं और राजनीतिक में उनका आना किसी संयोग से कम नहीं हैं. उन्होंने तो दमिश्क विश्वविद्यालय से नेत्र संबंधी अध्ययन में डिग्री हासिल की थी और इसकी क्षेत्र में अपना करियर बनाना चाहते थे. बाद में अपनी पढ़ाई के लिए वो लंदन भी गए.

लेकिन 1994 में उनके बड़े भाई बासिल अल असद की कार दुर्घटना में मौत हो गई जिन्हें सीरिया में 25 साल से भी ज्यादा समय तक एक छत्र राज करने वाले हाफेज अल असद के उत्तराधिकार के तौर पर तैयार किया जा रहा था.

पश्चिमी जगत ने असद पर अपने ही लोगों की हत्याएं कराने के आरोप लगाए.

बासिल की मौत के बाद बशर ने राजनीति का रूख किया. वर्ष 2000 में सीरिया की सत्ता मिलने से पहले छह वर्षों के दौरान बशर ने अपनी सैन्य ट्रेनिंग पूरी की और अरब जगत से साथ साथ बाकी दुनिया के नेताओं से मुलाकात की. इस दौरान उन्होंने सीरियाई राजनीति की हर छोटी बड़ी चीजों का जान लिया था.

बशर के सत्ता संभालते ही सरकार के वफादारों उनके रास्ते की सभी अड़चनों को दूर कर दिया. उन्होंने संविधान में बदलाव करके 34 साल के बशर को देश का राष्ट्राध्यक्ष बना दिया.

जुलाई 2000 में हुए जनमत संग्रह में उन्हें 97 प्रतिशत वोटों के साथ राष्ट्रपति घोषत किया गया.

सुधारवादी 'मुखौटा'

सत्ता संभालते ही बशर ने सुधारों का रास्ता अपनाया लेकिन इससे सत्ता प्रतिष्ठान यानी सेना, सत्ताधारी बाथ पार्टी और अल्पसंख्यक अलावी समुदाय में कई तरह की चिंताएं पैदा हो गई हैं. बशर का संबंध भी शिया संप्रदाय से जुड़े अलावी समुदाय से है जबकि देश की बहुसंख्यक आबादी सुन्नी है.

सुधारों के कारण सत्ता प्रतिष्ठान को अपना प्रभाव घटने का डर सताने लगा, इसलिए उनकी रफ्तार धीमी पड़ गई.

इसके बाद एक दशक तक सीरिया में आपात शासन लागू रहा जिसमें सुरक्षा एजेंसियों ने बिना गिरफ्तारी वारंट के लोगों को हिरासत में रखा और उन्हें किसी से संपर्क नहीं करने दिया गया. वहीं कुर्दिश और इस्लामी कार्यकर्ताओं को लंबी लंबी जेल की सजाएं सुनाई गई हैं.

इसके अलावा आर्थिक उदारीकरण का फायदा सिर्फ चुनिंदा धनाढ्य लोगों को ही हुआ. आम जनता के पास अपनी बेहतरी के लिए ज्यादा मौके नहीं थे.

असद ने 2007 में दूसरी बार 97 प्रतिशत वोटों के साथ जनमत संग्रह जीता और अगले सात साल के लिए फिर देश के राष्ट्रपति बन गए.

कट्टरपंथी कूटनीति

ईरान के साथ असद के काफी करीबी रिश्ते रहे हैं.

बशर अल असद ने अपने पिता की तरह इसराइल के प्रति कट्टर नीति को जारी रखा. उन्होंने 2003 में इराक पर अमरीकी हमले का मुखर विरोध किया. कहा जाता है कि सीरियाई अधिकारियों ने इराक में चरमपंथी गुटों का साथ दिया था जिसे लेकर अमरीका खासा नाराज भी हुआ, लेकिन सीरिया और अरब जगत में असद सरकार के इस फैसले का स्वागत हुआ.

हाल के वर्षों में असद ने ईरान के साथ साथ रूस और चीन से भी नजदीकियां कायम की हैं. सीरिया में विद्रोह शुरू होने से पहले तक तुर्की और फ्रांस के साथ ही भी असद के अच्छे रिश्ते थे.

सीरिया संकट के दौरान रूस और चीन ने असद का पूरा साथ दिया. उन्होंने सीरिया पर प्रतिबंधों के कई प्रस्तावों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो किया.

दूसरी तरफ अरब लीग ने एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सीरिया की सदस्यता को निलंबित कर दिया क्योंकि वह लीग की शांति योजना को लागू करने में नाकाम रहा. लीग से बशर से पद छोड़ने को भी कहा.

लेकिन विद्रोहियों के खिलाफ पूरी सख्ती से पेश आने वाले असद अपने देश को विदेशी साजिश का शिकार बताते रहे.

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