'कहीं आपके फ़ोन पर किसी की नज़र तो नहीं'

  • 7 जून 2013

अमरीकी खुफिया विभाग के प्रमुख जेम्स क्लैपर ने अख़बार में छपी उन ख़बरों की निंदा की है जिसमें कहा गया है कि अमरीकी खुफिया एजेंसियां लोगों की गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए अग्रणी इंटरनेट कंपनियों के सर्वर को टैप कर रही हैं.

उन्होंने खुफिया विभाग का बचाव करते हुए कहा कि ऐसी रिपोर्टों में कई ख़ामियां हैं और इनसे खुफिया एजेंसियों की ख़तरों से आगाह करने की क्षमता पर दीर्घकालिक और अपूरणीय असर पड़ेगा.

वॉशिंगटन पोस्ट और गार्डियन में छपे लेखों में कहा गया है कि अमरीकी एजेंसियां माइक्रोसॉफ्ट, एप्पल, गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियों की तस्वीरें और ईमेल हासिल कर रही थीं. हालांकि एप्पल और फेसबुक ने इस बात से इनकार किया है उन्होंने खुफिया एजेंसियों को उनके सर्वर तक सीधी पहुंच दी थी.

प्रिज़्म

अखबारों में छपी ख़बरों में एक कथित प्रोग्राम की चर्चा है जिसके ज़रिए नौ इंटरनेट कंपनियों के सर्वर से जानकारियां हासिल की गईं.

हालांकि इंटरनेट कंपनियों ने सरकारी एजेंटों को अपने सर्वर तक पहुंच देने की बात से इनकार किया है.

अमरीकी राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी के निदेशक ने कहा कि वो अमरीकियों को आश्वस्त करना चाहते हैं कि खुफिया समुदाय उनकी नागरिक स्वतंत्रता और निजता का सम्मान करने के प्रति प्रतिबद्ध है.

उन्होंने कड़े शब्दों वाला अपना बयान गुरुवार को तब जारी किया जब ब्रिटेन के गार्डियन अखबार ने कहा कि एक गोपनीय अदालती आदेश में फोन कंपनी वेरीज़ॉन को अपने फोन रिकॉर्ड्स नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी को हर दिन देने होते थे.

अमरीकी खुफिया विभाग के प्रमुख जेम्स क्लैपर ने खबर की कड़े शब्दों में निंदा की है.

उसके बाद ही वॉशिंगटन पोस्ट और गार्डियन अखबारों ने ये खबर छापी कि अमरीकी खुफिया एजेंसियों ने नौ इंटरनेट कंपनियों के सर्वर तक पहुंच बनाई ताकि लोगों की गतिविधियों पर नज़र रखी जा सके और इस प्रोग्राम को नाम दिया गया 'प्रिज़्म'.

प्रिज़्म के बारे में सामने आ रही रिपोर्टों से ये सवाल उठ रहे हैं कि अमरीकी सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किस हद तक नागरिकों की निजता में हस्तक्षेप करती है.

एनएसए ने ये स्वीकार किया है कि वो लगातार लाखों की संख्या में फोन रिकॉर्ड्स जमा करती रही है.

ख़तरे

ख़बरों के मुताबिक प्रिज़्म को 2007 में घरेलू सर्विलांस के एक कार्यक्रम के तहत विकसित किया गया था.

जेम्स क्लैपर ने कहा कि कम्यूनिकेशन कलेक्शन प्रोग्राम को अमरीका से बाहर गैर अमरीकी लोगों के बारे में खुफिया जानकारी हासिल करने के लिए डिज़ाइन किया गया था.

उन्होंने कहा, "इसका मक़सद जान-बूझकर किसी अमरीकी नागरिक या अमरीका में रह रहे किसी व्यक्ति को टार्गेट करने का नहीं था."

क्लैपर ने कहा, "इस प्रोग्राम के तहत जानकारियां जुटाना हमारे विदेश आधारित खुफिया तंत्र का अहम हिस्सा है और इसका इस्तेमाल हमारे देश को विभिन्न तरह के ख़तरों से सुरक्षित रखने के लिए किया जाता है."

जैसा कि कहा गया है कि इस कार्यक्रम का लक्ष्य अमरीकी नागरिकों की खुफिया निगरानी रखना नहीं था, लेकिन वॉशिंगटन पोस्ट का कहना है कि खुफिया जानकारी जुटाने के लिए बड़ी संख्या में अमरीकियों की स्क्रीनिंग की गई.

ख़बर में आगे कहा गया है कि इस तरह प्रिज़्म के ज़रिए इकट्ठा किए गए आंकड़े राष्ट्रपति को प्रतिदिन दी जाने वाली जानकारियों का अहम हिस्सा रहे हैं.

फेसबुक और गूगल ने जानकारी देने की बात से इनकार किया है.

वॉशिंगटन पोस्ट ने इस कार्यक्रम में शामिल उन नौ कंपनियों के नाम दिए हैं जिनके सर्वर से जानकारी हासिल की गई. उनके नाम हैं माइक्रोसॉफ्ट, याहू, गूगल, फ़ेसबुक, पैलटॉक, एओएल, स्काइप, यू ट्यूब और एप्पल.

माइक्रोसॉफ्ट ने बीबीसी को एक बयान जारी कर कहा है कि कंपनी ने क़ानूनी आदेश दिखाए जाने पर कुछ ग्राहकों से संबंधित आंकड़े खुफिया एजेंसी को दिए हैं.

हालांकि याहू, एप्पल और फेसबुक ने कहा है कि उन्होंने सरकार को उनके सर्वरों तक सीधी पहुंच नहीं दी है.

लोगों में खलबली

बुधवार को ऐसी जानकारी सामने आई कि अमरीकी की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी लाखों अमरीकियों के फोन कॉल्स पर नज़र रख रही है और फोन कंपनी वेरीज़ोन अपने ग्राहकों के फोन डिटेल्स की जानकारी नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी को मुहैय्या करा रही है.

इस ख़बर से इतनी खलबली मची है कि फोन उपभोक्ता अब अपने फोन कॉल्स की डिटेल की पड़ताल कर रहे हैं. वो ये देखने की कोशिश कर कर रहे हैं कि किसने और कब उन्हें फोन किया था.

उन्हें इस बात पर भी हैरानी हो रही है कि सरकार इस प्रक्रिया से उनके बारे में आखिर क्या जानना चाहती है?

गार्डियन अख़बार का एक लेख एक खुफिया अदालती आदेश पर आधारित है जिसमें कहा गया है कि वेरीजॉन को इस बात की जानकारी देनी होगी कि कहां से कॉल की जा रही है, कॉल की अवधि क्या है और फोन पर बात करनेवाले दोनों पार्टियों के नंबर क्या हैं?

ये अभी साफ़ नहीं है कि इस कवायद में टेक्स्ट मैसेज को शामिल किया गया है या नहीं.

हालांकि कहा गया है कि अधिकारी इन कॉल्स के कंटेंट और लोगों की आपसी बातचीत की जांच नहीं करेंगे.

एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने बताया, "लेख में छपे सरकारी आदेश में सरकार को ये अनुमति नहीं है कि वो किसी के फोनकॉल को सुने."

अमरीकी संविधान के चौथे संशोधन के तहत फोन पर किसी की बातचीत को सुनने पर रोक है.

लेकिन अगर ये सूचना किसी तीसरी पार्टी के साथ साझा की जाती है जैसे कि फोन कंपनी, तो कोई समस्या नहीं है - ये कहना है क टेक्सास विश्वविद्यालय में क़ानून के प्रोफ़ेसर रॉबर्ट चेस्नी का जो राष्ट्रीय सुरक्षा में विशेषज्ञता रखते हैं.

एनएसए के अधिकारी इन कॉल्स के आधार पर ही एक व्यक्ति के बारे में जानकारी जुटाते हैं.

इस तरह से जानकारी जुटाना वैध है और ये 2001 के पैट्रियट एक्ट के दायरे में आता है. इस क़ानून को किसी चरमपंथी हमले से बचाव में मदद के लिए बनाया गया था.

सुरक्षा की चिंता

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि अमरीकियों के बारे में फोन कॉल जैसी निजी जानकारी जुटाना एक उपयोगी कार्रवाई है.

ये खबर वॉशिंगटन पोस्ट और गार्डियन में छपी थी.

बाल्टीमोर में एफबीआई के प्रवक्ता रिचर्ड वोल्फ़ का कहना है, "फोन कंपनियों से जानकारी जुटाना मुझे लगता है कि एक नियमित कार्यकलाप है लेकिन ऐसा किसी मामले की जांच के दौरान ही किया जाता है."

एनएसए की गतिविधियों के बारे में हाउस इंटेलिजेंस कमेटी के चेयरमैन माइक रॉजर्स कहते हैं कि. "इस कार्यक्रम का इस्तेमाल अमरीका में एक चरमपंथी हमले को रोकने के लिए किया गया था."

जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में क़ानून के प्रोफ़ेसर स्टीफन सॉल्जबर्ग कहते हैं कि अधिकारी फोन रिकॉर्ड्स से मिली सूचनाओं का इस्तेमाल लोगों के व्यवहार की पड़ताल के लिए कर सकते हैं. इस प्रक्रिया से ये जानकारी हासिल हो सकती है कि चरमपंथी कहां छुपे हो सकते हैं और उनकी योजना कहां हमला करने की है?

वो बताते हैं कि उदाहरण के तौर पर एनएसए के अधिकारी अमरीका से यमन और पाकिस्तान में किए गए फोन कॉल की जांच कर सकते हैं जिन्हें हाल के वर्षों में चरमपंथ के नज़रिए से संवेदनशील माना जाता रहा है.

ओबामा शासन के दौरान अमरीका नियंत्रित पायलट रहित ड्रोन हमलों में इन देशों में दर्जनों चरमपंथियों को मारा गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि फोन रिकॉर्ड्स के आधार पर जुटाई गई जानकारी का चरमपंथ को नियंत्रित करने में बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है.

हालांकि कुछ लोग इन दावों से इत्तेफ़ाक नहीं रखते. सॉल्जबर्ग कहते हैं कि,"कई लोग इस बात से सशंकित हो जाते हैं कि सरकार उनके फोन नंबर पर नज़र रख रही है."

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