करोड़ों में खेलतीं ट्यूशन क्वीन्स

 शनिवार, 1 दिसंबर, 2012 को 16:07 IST तक के समाचार
ट्यूटर किंग

हॉन्गकॉन्ग के शहरों में आपको हर जगह इस तरह के बिलबोर्ड देखने के मिल जाएंगे

अगर आप चीन के शहर हॉन्गकॉन्ग जाएं तो वहां के शॉपिंग मॉल्स ओर बसों पर लगे बड़े-बड़े आकर्षक पोस्टरों को देखकर भ्रमित ना हों, क्योंकि ये पोस्टर चीन के टेलीविज़न या फिल्मस्टारों के ना होकर वहां के 'ट्यूटर किंग्स' और 'ट्यूटर क्वीन्स' के हैं.

ये ट्यूटर किंग्स और क्वीन्स हॉन्गकॉन्ग के स्कूली बच्चों की औसत रिपोर्ट कार्ड को बेहतर करने का काम करते हैं.

हॉन्गकॉन्ग के समाज पर काफी हद तक बाज़ारवाद हावी है. वहां सुंदर और आकर्षक होना सफलता की गारंटी है और डिज़ाइनर कपड़ों में लिपटे ये युवा ट्यूटर वहां के स्कूली बच्चों के रोल मॉडल हैं.

इन रोल मॉडल्स की जीवन-शैली भी उतनी ही भव्य हैं जिनती इनकी तस्वीरें. इनमें से कई अरबपति हैं जिन्हें अक्सर टेलीविज़न कार्यक्रमों में ज्ञान बांटते देखा जा सकता है.

हॉन्गकॉन्ग के सबसे बड़े ट्यूटर समूह किंग्स ग्लोरी में ट्यूटर क्वीन के रूप में मशहूर 26 साल की केली मॉक कहती हैं, ''अगर आप टॉप पर पहुंचना चाहते हैं तो आपका खूबसूरत और आकर्षक होना मददगार होता है.''

केली मॉक के डिज़ाइनर कपड़े सिर्फ बिलबोर्ड के लिए नहीं पहनती हैं, बल्कि वो क्लास के बाहर भी ऐसे ही रहना पसंद करती हैं.

लेकिन वे ये भी कहने से नहीं चूकतीं कि अगर उनके छात्र उनके विषय में अच्छे नंबर नहीं लाएंगे तो उनकी मांग कम हो जाएगी.

रॉकस्टार वाली छवि

बिकॉन कॉलेज के रिचर्ड इंग को हॉन्गकॉन्ग का पहला स्टार ट्यूटर होने का श्रेय जाता है. एक पूर्व-माध्यमिक स्कूल के टीचर रह चुके रिचर्ड कहते हैं कि उन्हें इसकी युक्ति अपनी कलाकार बहन के लिए छपे एक विज्ञापन के लिए फोटो खिंचवाने के दौरान आई.

वे कहते हैं कि स्कूलों में सभी शिक्षक एक जैसे और नीरस दिखते हैं.

"जिस समाज में सफलता का मतलब रिपोर्ट कार्ड में पाए गए अंक होते हैं, वहां इस तरह के ट्यूटोरियल्स सीधे-सीधे पैसा कमाने का ज़रिया हैं."

एशियन डेवेलपमेंट बैंक

लेकिन अब बिकॉन की तस्वीरें अंगूठियों, पेपर फोल्डर्स, पेन और अन्य गिफ्ट वाले सामानों में नज़र आती हैं, जिस कारण आज उनकी स्कूली बच्चों के बीच सबसे ज्य़ादा मांग है.

सेलेब्रिटी ट्यूटर की अवधारणा कहीं ना कहीं पूरे एशिया में 'आउट-ऑफ-स्कूल' यानि स्कूल से बाहर की जाने वाली पढ़ाई के बढ़ते चलन का नतीजा है और इसे बढ़ाने में कहीं ना कहीं स्कूली छात्रों में मन में बसे परीक्षा का डर, उनके अति महत्वाकांक्षी माता-पिता और शीर्ष शिक्षण संस्थानों में प्रवेश पाने की जद्दोजहद है.

एशियन डेवेलपमेंट बैंक के अनुसार, ''जिस समाज में सफलता का मतलब रिपोर्ट कार्ड में पाए गए अंक होते हैं, वहां इस तरह के ट्यूटोरियल्स सीधे-सीधे पैसा कमाने का ज़रिया हैं.''

हॉन्गकॉन्ग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मार्क ब्रेए के अनुसार हॉन्गकॉन्ग में कॉलेज के अंतिम वर्ष की पढ़ाई कर रहे 72 प्रतिशत छात्र प्राइवेट ट्यूटरों के पास पढ़ने के लिए जाते हैं.

हालांकि ये स्टार ट्यूटर, ग़रीब घरों के बच्चों को 100-100 के समूह में नोट्स और टिप्स भी देते हैं.

फायदा

प्रोफेसर ब्रेए के अनुसार, ''ट्यूशन का चलन सिर्फ हॉन्गकॉन्ग नहीं बल्कि पूरे एशिया में जोर पकड़ चुका है. दक्षिण कोरिया के प्राथमिक स्कूलों के 90 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं.''

ब्रेए के मुताबिक, ''दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, श्रीलंका और भारत में ऐसे स्टार ट्यूटर का इस्तेमाल छात्रों को प्रभावित करने के लिए किया जाता है. वे इससे चर्चा में भी बने रहते हैं.''

ट्यूटर किंग

कई बार इन ट्यूटरों को इतना पैसा मिलता है कि उनकी गिनती अरबपतियों में होती है

भारत के कोटा में करियर प्वाइंट कोचिंग स्कूल के मुख्य अधिकारी प्रमोद माहेश्वरी कहते हैं, ''ये चलन हमारे यहां लंबे समय से है. हमारे पास देशभर से छात्र कोचिंग लेने आते हैं. इससे फायदा तो होता है लेकिन सिर्फ इसके भरोसे हम ये काम नहीं कर सकते. इसके लिए स्कूलों की अक्षमता भी दोषी है.''

जानकार कहते हैं कि पूरे भारत में शिक्षा-व्यवस्था सही नहीं है और यहां लाखों छात्र प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियां करते हैं, ऐसे में ये बहुत बड़ा बाजा़र साबित हो रहा है.

चीन में प्राइवेट ट्यूटोरियल का चलन वर्ष 1990 के बाद शुरू हुआ. ये वो दौर था जब चीन की अर्थव्यवस्था उदार थी. आज न्यू-ओरिएंटल एजुकेशन एंड टेक्नोलॉजी एशिया का सबसे बड़ा ट्यूशन स्कूल है जहां 20 लाख से ज्यादा छात्र पढ़ते हैं.

इतना ही नहीं, ये ट्यूशन सेंटर साल 2006 से न्यूयॉर्क स्टॉक एक्सचेंज की सूची में भी शामिल है. इसके संस्थापक माइकल-यू की गिनती चीन के बड़े अरबपतियों में होती है.

ऐसा देखा गया है कि वे पूर्वी एशियाई देश जो अंतरराष्ट्रीय स्कूल प्रतियोगिताओं में अच्छा करते हैं, उन्हें इस चलन से काफी मदद मिलती है.

लेकिन प्रोफेसर ब्रेए कहते हैं कि ऐसी प्रतियोगिताओं में स्कैंडिनेविया जैसे देश भी शामिल हैं जहां प्राइवेट ट्यूशन का चलन नहीं है.

ट्यूशन पर रोक

ट्यूशन पर कई बार रोक लगाने की कोशिश भी की गई है. वर्ष 1980 के दौरान दक्षिण कोरिया ने प्राइवेट ट्यूशन पर रोक लगाने का आदेश भी दिया था.

लेकिन वो सफलतापूर्वक लागू नहीं किया जा सका. लेकिन इससे ये ज़रूर पता चला कि अतिरिक्त ट्यूशन करने वाले छात्र काफी दबाव में रहते थे और अक्सर क्लास में सो जाया करते थे.

ट्यूटर किंग

हॉन्गकॉन्ग के शहरों में चलने वाली बसों में ऐसे बिलबोर्ड देखना आम बात है

वर्ष 2009 में दक्षिण कोरिया की सरकार ने स्कूली बच्चों के बचपन को बचाने के लिए ट्यूटोरियल क्लास में बिताए जाने वाले समय को सीमित करने की कोशिश की, लेकिन उसका भी कोई फायदा नहीं हुआ. अब ट्यूशन क्लास ऑनलाइन शुरू हो गए.

एडीबी की रिपोर्ट के अनुसार पूरे एशिया प्रांत में रहने वाले परिवार अपनी आजीविका का एक बड़ा भाग ट्यूशन पर खर्च करते हैं. इससे भले ही एक छात्र की उपलब्धियां बेहतर होती हैं, लेकिन इससे सामाजिक असमानताएं भी बढ़ती हैं.

परीक्षा का भूत

हालांकि कुछ संस्कृतियों में ट्यूशन लेने के प्रति एक झुकाव भी देखा गया है. इसमें कनाडा के वैंकूवर और ऑस्ट्रेलिया के सिडनी शामिल हैं.

हॉन्गकॉन्ग ने अभी हाल में ही ब्रिटेन में चलाए जा रहे जीसीएसई और ए-लेवल प्रणाली को शुरू किया है. इस पद्धति में हर छात्र को 17 साल की उम्र में 'सिंगल एक्ज़ाम' देना होता है, जिसमें सफल होने पर ही उन्हें यूनिवर्सिटी में दाखिला मिलता है.

ऐसे में ट्यूटरों की भीड़ में छात्रों के लिए ये तय करना मुश्किल होता है कि वे किससे पढ़ें? इसलिए वे सब ट्यूटर 'किंग्स' और 'क्वीन्स' की शरण में चले जाते हैं.

रिचर्ड इंग इस बात से इंकार करते हैं कि ट्यूटर की वजह से घबराहट फैली हुई है. उनके अनुसार, ''घबराहट और तनाव की वजह तो परीक्षाएं हैं. अगर हॉन्गकॉन्ग के स्कूलों में परीक्षाएं बंद हो जाए तो कोई हमारे पास नहीं आएगा.''

इसलिए ये तय करना मुश्किल है कि ट्यूशन से छात्रों के जीवन में तनाव कम होता है या इससे उन्हें फायदा होता है.

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