क्यों कन्नी काट रहे हैं विदेशी निवेशक भारत से?

  • 31 अगस्त 2013

एक देश के संकट की गंभीरता का अंदाज़ा अक्सर इस बात से लगाया जा सकता है कि उसकी तुलना किस संकट से की जा रही है.

साल 2008-2009 में जब वैश्विक वित्तीय संकट अपने चरम पर था, उस समय अमरीका के आर्थिक हालात के लिए 1930 के दशक की मंदी को संदर्भ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था.

हाल के सालों में ग्रीस के कर्ज़ संकट की तुलना साल 2001 में अर्जेन्टीना की स्थिति से की गई. उस साल अर्जेंन्टीना तब तक के इतिहास में सबसे बड़ा संप्रभु कर्ज़दार देश था.

भारत की बात करें तो उसके हाल के आर्थिक हालात से एक बार फिर उस स्थिति की चर्चा शुरु हो गई है जो उसके सामने साल 1991 में थी. उस समय को अकसर भारत का सबसे बुरा आर्थिक संकट माना जाता है.

उस वित्तीय संकट से रूपया लुढ़क गया था और उसका विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो गया था. हालात इतने ख़राब हो गए थे कि भारत को आखिरकार अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेनी पड़ी थी.

विश्लेषक मानते हैं कि मौजूदा हालात साल 1991 जितने बुरे नहीं हैं, लेकिन फिर भी स्थिति चिंताजनक है. फ़िलहाल भारत के पास सात महीने के आयात के लिए विदेशी मुद्रा है जबकि साल 1991 में सिर्फ़ 15 दिन के आयात का ही इंतज़ाम था.

आईएचएस ग्लोबल इनसाइट कंपनी के प्रबंध निदेशक टोनी नैश कहते हैं, "भारत की मौजूदा आर्थिक स्थिति की तुलना साल 1991 से होना ही दिखाता है कि इससे जुड़ी चिंताएं कितनी गंभीर हैं. इसमें कोई शक़ नहीं है कि भारत में हालात बहुत ज़्यादा ख़राब होते जा रहे हैं."

बढ़ती मुश्किलें

चिंता का एक मुख्य कारण है भारत का तेज़ी से बढ़ता चालू खाते में घाटा जो पिछले साल अपने उच्चतम स्तर सकल घरेलू उत्पाद, जीडीपी, का 6.7 प्रतिशत हो गया था.

चालू खाते में घाटा व्यवसाय का सूचकांक है और ये स्थिति तब आता है जब किसी देश का आयात बिल निर्यात से होने वाले उसकी कमाई से ज़्यादा हो. जितना ज़्यादा ये घाटा बढ़ता है उतना ज़्यादा देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है.

भारत की स्थिति और भी ज़्यादा जटिल इसलिए हो गई है क्योंकि विदेशी निवेशक भारतीय अर्थव्यवस्था से पैसा निकाल रहे हैं.

इस साल जून की शुरुआत से अब तक अंतरराष्ट्रीय निवेशकों ने भारतीय बाज़ारों से लगभग 12 अरब डॉलर निकाल लिए हैं जिससे स्टॉक मार्किट और रुपये, दोंनो, को ही नुकसान हुआ है.

इस साल की शुरुआत से अब तक भारतीय रुपया 20 प्रतिशत से ज़्यादा गिर चुका है. इससे भारत के आयात ज़्यादा मंहगे हो गए हैं और देश की आर्थिक मुश्किलों में इजाफ़ा हुआ है.

अंतरराष्ट्रीय निवेशक विभिन्न कारणों से भारत से पैसा निकाल रहे हैं जिनमें से मुख्य वजह भारतीय अर्थव्यवस्था का धीमा पड़ा और अमरीका में सुधार आना शामिल है.

नोमुरा में एशिया मुद्रा कारोबार के प्रमुख स्टुअर्ट ओक्ले कहते हैं, "अगर आप एक निवेशक हैं और आप अपना पैसा एक ऐसी अर्थव्यवस्था में लगाना चाहते हैं जिसमें थोड़ा ख़तरा है, तो आप ऐसी अर्थव्यवस्था चुनेंगे जिसमें एक स्थिर अर्थव्यवस्था से बेहतर फ़ायदा देने की क्षमता हो."

ओक्ले आगे कहते हैं, "लेकिन भारत वैसा विकल्प नहीं रहा क्योंकि अब भारत और अमरीका के विकास के बीच का अंतर ख़त्म हो गया है."

इस वर्ष जनवरी से मार्च तक की तिमाही में भारत की अर्थव्यवस्था 4.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी जबकि अमरीकी अर्थव्यवस्था दूसरी तिमाही में 2.5 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ी.

भारत का आयात बिल निर्यात से होने वाले उसकी कमाई से ज़्यादा है जिससे चालू खाते में घाटा बढ़ गया है.

'विश्वसनीयता का संकट'

इससे निपटने के लिए भारत के नीतिनिर्धारक ऐसे कदम उठा रहे हैं जिससे न सिर्फ़ रुपये की गिरती कीमत थम सके बल्कि देश में विदेशी निवेश फिर से आ सके. लेकिन उनकी कोशिशों के नतीजें ज़्यादा उत्साहवर्धक नहीं हैं.

भारत ने पिछले साल मल्टी-ब्रांड खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मंज़ूरी दे दी. विकास के लिहाज़ से ये एक अहम सेक्टर माना जा रहा था. लेकिन अब तक किसी भी बड़े विदेशी ब्रांड ने भारतीय बाज़ार में दिलचस्पी नहीं दिखाई है.

विश्लेषक कहते हैं कि निवेशकों को चिंता है कि नीति बदलाव जारी रहेंगे भी या नहीं.

बार्कलेज़ कैपिटल के मुख्य भारतीय अर्थशास्त्री सिद्धार्थ सान्याल का कहना है, "मुख्य नीतियों पर देश के दो मुख्य राजनीतिक दलों के रवैये और दृष्टिकोण में बहुत फ़र्क है."

साल 2014 में भारत में आम चुनाव होने हैं. ऐसे में निवेशकों को डर है कि नीतियां जारी रहती हैं या नहीं, ये इस पर निर्भर करेगा कि कौन सी पार्टी सत्ता में आती है.

टोनी नैश कहते हैं, " भारत इस वक्त विश्वसनीयता के संकट से जूझ रहा है. निवेशकों को इस बात पर शक़ है कि क्या नई सरकार के पास सुधारों को जारी रखने के लिए जनादेश, समर्थन और इच्छाशक्ति होगी."

एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था के धीमे पड़ने से हालात और मुश्किल हो गए हैं.

बार्केलेज़ कैपिटल के सिद्धार्थ सान्याल कहते हैं, "अगर देश में तेज़ी से विकास हो रहा होता है तो फिर भी शायद विदेशी निवेशक सोचविचार कर ख़तरा उठाते. लेकिन अगर आपका बड़ा कारोबार है तो इस वक्त आप कहेंगे कि मैं थोड़ा इंतज़ार करता हूं और देखता हूं कि क्या हालात बनते हैं क्योंकि वैसे भी मुझे कुछ ख़ास नुकसान नहीं हो रहा."

भारत के सबसे अग्रणी और सम्मानीय व्यवसायीयों में से एक रतन टाटा के मुताबिक ''भारत ने दुनिया का विश्वास खो दिया है.''

पेचीदा हालात

इस सब के बीच भारत के नीतिनिर्धारकों के सामने एक पेचीदा स्थिति है जिससे मामला और भी जटिल हो जाता है.

अर्थव्यवस्था के धीमे पड़ने से अब वित्तीय नीति में ढील देने की मांग उठ रही है ताकि कारोबार और उपभोक्ता इस मुश्किल समय से निपट सकें.

लेकिन रुपये की लगातार गिरती कीमत और प्याज़ जैसी ज़रूरी चीज़ों के दामों में बढ़ोतरी के चलते कोई भी अहम कदम उठाना इतना आसान नहीं होगा.

विश्लेषक मानते हैं कि इन सब कारकों के मद्देनज़र भारत के लिए सबसे ज़रूरी है अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के विश्वास को बहाल करना. इससे देश में निवेश आने में मदद मिलेगी जिससे आर्थिक विकास बढ़ेगा और रुपये को संभाला जा सकेगा.

स्टुअर्ट ओक्ले के मुताबिक, "भारत 120 करोड़ उपभोक्ताओं का देश है और इसलिए इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि यहां बहुत ज़्यादा संभावना है और विदेशी कंपनियां वहां जाना चाहती हैं. लेकिन भारत को बहुत अधिक सुधारों की ज़रूरत है जो सिर्फ़ नीति के स्तर पर ही नहीं है बल्कि उसे ये सुधार निवेशकों को आकर्षित करने की प्रणाली में भी करने होंगे."

माना जाता है कि साल 1991 के आर्थिक संकट ने भारत में सुधारों की शुरुआत की थी जिसका नतीजा था तेज़ विकास.

हालांकि इस बार हालात उतने ख़राब नहीं हैं लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसका समाधान और इससे निपटने का तरीका वही है.

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