'आर्थिक हालात चिंताजनक लेकिन क़ाबू में'

  • 17 अगस्त 2013
प्रधानमंत्री का कहना है कि 1991 जैसा सकंट नहीं है

रुपए में जारी गिरावट और चालू खाता घाटा बढ़ने के बावजूद कुछ अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सहमत हैं कि फ़िलहाल देश पर 1991 जैसे आर्थिक संकट के बादल नहीं हैं,

लेकिन वे सभी यह चेतावनी भी देते हैं कि अगर जल्द स्थितियों में सुधार नहीं हुआ तो भारत की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

वरिष्ठ पत्रकार और आर्थिक मामलों के जानकार प्रभाकर सिन्हा ने बीबीसी संवादादाता सुशीला सिंह से बातचीच के दौरान कहा, "अभी भी हमारे पास अच्छा ख़ासा विदेशी मुद्रा भंडार है, इसलिए भुगतान संतुलन की स्थिति 1991 जैसी हो जाए, ऐसे हालात नहीं हैं."

उन्होंने कहा कि अभी दिक़्क़त नहीं है, लेकिन अगर इस स्थिति को क़ाबू में नहीं किया गया तो भारतीय अर्थव्यवस्था के ऊपर से लोगों का भरोसा उठ जाएगा और इस सूरत में भारत से पूंजी का पलायन तेज़ी से होगा और रूपया भी उतनी ही तेज़ी से टूट सकता है.

प्रभाकर कहते हैं कि इस संकट से निपटने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक और भारत सरकार को मिलकर क़दम उठाने की ज़रूरत है, जो बहुत सख़्त भी न हो.

उनके मुताबिक़ इस समय आयात पर प्रतिबंध लगाने जैसा ऐसा कोई क़दम नहीं उठाना चाहिए, जिसका अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक असर हो.

सरकार की तरकश के तीर

1991 में देश के पास केवल 15 दिनों का विदेशी मुद्रा भंडार बचा था.

प्रभाकर सिन्हा ने कहा कि जहां तक पेट्रोलियम पदार्थों के आयात की बात है तो अगर अर्थव्यवस्था बढ़ रही है तो उसका आयात तो बढ़ेगा ही. उसे क़ाबू में करना मुश्किल है.

लेकिन सोने के आयात को रोकना होगा. और इसके लिए सरकार को एक ऐसी स्थिति बनानी चाहिए कि आम आदमी को सोने से बेहतर निवेश के विकल्प मिलें.

प्रभाकर के मुताबिक़ ''अगर ऐसी स्थिति तैयार नहीं होती है तो आप ज़बरदस्ती सोने का आयात नहीं रोक सकते हैं.''

इस समय बहुत ज़रूरी है कि सरकार अपने चालू खाता घाटे को कम करे और निवेशकों के अंदर एक भरोसा पैदा करे कि भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर पटरी पर आएगी.

सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वे लोगों को विश्वास दिलाए कि उनका पैसा सुरक्षित ही नहीं रहेगा बल्कि उस पर अच्छा रिटर्न भी मिलेगा.

इसलिए सिन्हा के अनुसार सरकार को माहौल ठीक करने पर ख़ास तौर से ध्यान देना चाहिए.

उन्होंने कहा कि इस समय भारतीय निवेशकों का मनोबल काफ़ी नीचे है और जब तक उसे बहाल नहीं किया जाता है तो केवल अमरीकी अर्थव्यवस्था से भारत की अर्थव्यवस्था नहीं सुधर सकती है.

उन्होंने कहा कि अमरीकी अर्थव्यवस्था तो 1970 के दशक में बहुत तेज़ी से बढ़ रही थी, लेकिन हम 'हिन्दू ग्रोथ रेट' से बढ़ रहे थे. जब तक आप यहां निवेश का वातावरण नहीं बनाते हैं, तब तक आप वैश्विक अवसरों का फ़ायदा नहीं उठा सकेंगे.

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