बच्चों के कार्टून पर चलती 'क़ैंचियां'

  • 18 अगस्त 2013
कार्टून
आज बच्चे 'डोरेमोन', 'शिनचैन' जैसे कार्टून चरित्रों के दीवाने हैं.

आजकल कार्टून की दुनिया भी अपनी सोच और हास्य में बॉलीवुड फ़िल्मों की तरह हो गई है. फ़िल्मों पर 'क़ैंची' चलनी तो आम बात थी ही अब बच्चों के कार्टूनों पर भी क़ैंची लगने लगी है.

जिन कार्टूनों को देखकर बच्चे हँसते हैं, ख़ुश होते हैं उन पर भी 'कैंची' चलने का दौर शुरू हो गया है.

भारत में पिछले एक दशक में 'जापानी' कार्टूनों ने अपना दबदबा बनाया है. जो बच्चे 'टॉम एंड जेरी' और 'टेलस्पिन' जैसे कार्टून देखा करते थे. वहीँ आज 'डोरेमोन', 'शिनचैन' जैसे कार्टून चरित्रों के दीवाने हैं.

बी.सी.सी.सी, यानि 'ब्राडकास्टिंग कंटेंट कम्प्लेंट्स काउंसिल' एक संस्था है. यहां टेलीविज़न पर दिखाए जा रहे कार्यक्रम के 'आपत्तिजनक' दृश्यों के विरोध में कोई भी शिकायत दर्ज करा सकता है.

हाल ही में बी.सी.सी.सी में बहुत से माता पिता ने शिकायतें दर्ज कीं. इन शिकायतों में कहा गया कि कार्टून चैनल 'अनुचित' दृश्य दिखा रहे हैं. बी.सी.सी.सी ने तुरंत इन कार्टून चैनलों को हिदायत दी की वे ऐसा कोई दृश्य न दिखाए जो बच्चों के लिए ठीक न हों.

अजीब और मज़ेदार तब्दीलियाँ

अलका शर्मा अरसे से 'शिनचैन' कार्टून की आवाज़ रही. 'शिनचैन' जापानी कार्टून है.

अब कार्टून चैनल आपत्तिजनक दृश्यों को हटा कर उन्हें बिलकुल ही नए रूप में ढाल रहे हैं.

डबिंग इंडस्ट्री के निर्देशक या क्रिएटिव एक्सपर्ट ऐसे कार्टूनों पर अपनी पैनी नज़रें जमाए रखते हैं. उन्हें बदल कर वे ऐसे कार्टून तैयार करते हैं जिसके चाहने वाले देश भर के बच्चे होते हैं.

कार्टून किरदारों को डब करते वक़्त छोटी मोटी तब्दीलियाँ अक्सर हर विदेशी कार्टून और प्रोग्राम में करनी पड़ती है. क्योंकि उनके विचार स्थानीय दर्शकों के विचारों से मेल नहीं खाते.

पर कई बार कार्टून की तब्दीलियाँ काफ़ी अजीब और मज़ेदार होती हैं.

अलका शर्मा अरसे से शिनचैन की आवाज़ रही. 'शिनचैन' जापानी कार्टून है. वह एक पांच साल का बच्चा है और अपने माता पिता और बहन के साथ रहता है.

'ननेको दीदी से शादी की चाहत'

शिनचैन बेहद नटखट किरदार है और बच्चों में ख़ासा लोकप्रिय है. अलका शर्मा ने 'शिनचैन' में हुई कुछ मज़ेदार तब्दीलियों के बारे में बताया.

अलका बताती हैं की कई बार डबिंग डायरेक्टर स्क्रिप्ट बदल देते थे.

वे कहती हैं, “अक्सर हम 'ओरिजिनल' स्क्रिप्ट को छोड़ देते थे और स्क्रीन पर शिनचैन जो कर रहा है उसी से एक नयी कहानी बना लेते थे.”

उन्होंने आगे बताया, “अगर कोई ख़ूबसूरत लड़की जा रही है तो शिनचैन 'ओरिजिनल' स्क्रिप्ट में कहता था 'ओये होट्टी मेरे साथ डेट पर चलोगी'. तो हम उसे बदल कर बोलते थे 'अरे दीदी! आपकी ड्रेसिंग सेंस तो बहुत अच्छी है. मुझे भी अपने साथ शौपिंग पर ले चलो.’ इस तरह से हम उसे बिल्कुल सरल और सभ्य बना देते थे.’

घनश्याम शुक्ला पिछले 9 सालों में कई कार्टून चरित्रों को अपनी आवाज़ दे रहे हैं.

अलका बताती हैं, " 'ननेको दीदी' का एक किरदार होता था. सीरियल में इससे शिनचैन को बहुत प्यार है. शिनचैन सोचता है कि एक समय ऐसा आएगा जब वो 'ननेको दीदी' से शादी कर लेगा. मुझे याद है वो किस्सा जहाँ शिनचैन सोचता है कि उसने 'ननेको दीदी' से शादी कर ली है और वो उनके साथ हनीमून पर जा रहा है. पर हमने उसे बदल दिया."

वे आगे बताती हैं, "उस दृश्य में ऐसा होता है कि 'ननेको दीदी' ने वेडिंग ड्रेस पहन कर खड़ी हैं और शिनचैन उनके बग़ल में ही खड़ा है. तो हमने ऐसे दिखा दिया की शिनचैन उनकी वेडिंग का 'तोहफ़ा' है. बाद में वे बीच पर घूमने चले जाते हैं."

सरल और सभ्य दृश्य

घनश्याम शुक्ला ने पिछले 9 सालों में कई कार्टून चरित्रों को अपनी आवाज़ दी हैं. इन कार्टूनों में 'कोच्ची कामे', 'लकी मैन' और 'लूनर जिम' शामिल हैं.

घनश्याम कहते हैं, "एक बार 'ओजारु मारू', जो कि हंगामा चैनल पर आने वाला एक जापानी कार्टून था, का एक चरित्र करते वक़्त 'ओजारु' अपने सपने में पुहँच जाता है. वहां वह बहुत सारी लड़कियों के पीछे दौड़ता है.वे कहते हैं कि हमने उस दृश्य में ये दिखाया कि वो एक पेंटर है और जब वो अपनी पेंटिंग सबसे अच्छी दोस्त को दिखाता है तो उसे वो पेंटिंग पसंद नहीं आती और वो भाग जाती है."

बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता जावेद जाफ़री ने 'मिक्की माउस', 'टेलस्पिन' और 'डॉन कर्नाज' के साथ साथ कई कार्टून चरित्रों को अपनी आवाज़ दी.

जावेद कार्टून की पटकथा में लाई जा रही तब्दिलियों पर कहते हैं, "देखो, अगर हम चाहते हैं की हमारे बच्चे उस तरह का 'ह्यूमर' न देखें जो की 'एडल्ट' है तो ये तो करना ही पड़ेगा."

'ये तो करना ही पड़ेगा'

मशहूर अभिनेता जावेद जाफ़री ने 'मिकी माउस', 'टेलस्पिन' जैसे कार्टून चरित्रों को अपनी आवाज़ दी है.

जावेद जाफ़री जावेद कहते हैं, "हर देश समाज का एक अलग नज़रिया होता है. अमेरिका में ऐसा कार्टून चल जाएगा क्योंकि उनकी सोच काफ़ी अलग है. लेकिन हमारे समाज में ऐसी चीज़ों को स्वीकार नहीं किया जाता. तो मेरे हिसाब से हमें उसमें तब्दीली तो करनी ही पड़ेंगी जब तक हमारी सोच में तब्दीली नहीं हो जाती. अब जैसे पहले फ़िल्मों में 'किसिंग' नहीं हुआ करते थें, पर अब है."

बीत कुछ वर्षों में कार्टून चैनल्स का दायरा काफ़ी बढ़ गया है. बच्चों के साथ साथ अब कई कार्टून चैनल्स बड़ों को भी काफ़ी लुभे रहे हैं.

कार्टून चरित्रों की बढ़ती लोकप्रियता देखते हुए यह कहना ग़लत नहीं होगा कि आने वाले समय में कार्टून इंडस्ट्री आज के मुक़ाबले कहीं ज़्यादा चर्चित होगी. पर ये बात बड़ी हैरान कर देने वाली है कि जो कार्टून हम टेलीविज़न पर देखते हैं वो 'असल' कार्टून नहीं होता.

इन कार्टूनों को देखने लायक़ बनाने में उन डबिंग डायरेक्टर्स और क्रिएटिव एक्सपर्ट्स का हाथ होता है जिनके बारे में कोई नहीं जानता.

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