भारत में इंटरनेट स्पीड की 'सच्चाई'

  • 15 मई 2013
इंटरनेट
Image caption इंटरनेट रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.

भारत में इंटरनेट स्पीड को लेकर बहस जारी है. टूजी से लेकर 5जी तक की तकनीकी शब्दों के दरम्यां स्पेक्ट्रम और स्पीड को लेकर काफी कुछ कहा सुना जा रहा है.

ये अच्छी बात है कि प्रयोग किए जा रहे हैं और नतीजतन दो चीजें हो रही हैं. एक तो स्पीड बढ़ती जा रही है. वायरलेस ट्रांसफर की स्पीड.

और उससे भी महत्वपूर्ण यह है कि जो स्पेक्ट्रम उपलब्ध है उसी में ज्यादा चैनल्स और अधिक से अधिक इस्तेमाल करने वालों की जरूरतों को पूरा करने की कोशिश की जा रही है.

लेकिन अगर आप ये सोचेंगे कि एक साल बाद हम एक पूरी बड़ी एचडी मूवी या ब्लू-रे फिल्म एक सेकेंड में फोन पर डाउनलोड कर लेंगे तो यह मुमकिन नहीं क्योंकि यह पूरे स्पेक्ट्रम पर निर्भर करेगा.

असलियत में कम स्पीड

और हम ये देख रहे हैं कि जो थ्रीजी अभी मौजूद है, उसकी स्पीड के बारे में कई तरह की बातें की जाती हैं. जैसे तीन मेगाबाइट प्रति सेकेंड या सात या 12 एमबीपीएस की डाउनलोडिंग स्पीड.

लेकिन असलियत में हमें जो स्पीड मिलती है वह बेहद कम होती है. कभी-कभी 100 किलो बाइट प्रति सेकेंडे तक.

यह तकनीक की समस्या नहीं है. यह यहां के तौर-तरीकों की समस्या है. यह स्पेक्ट्रम और अन्य उपलब्ध चीजों की समस्या है.

अब भारत में देखिए कि यहां मौजूद 80-90 करोड़ मोबाइल फोन हैं और वे एक ही स्पेक्ट्रम पर काम कर रहे हैं.

और अब जब कि यह कहा जा रहा है कि इतने ही लोग थ्रीजी इस्तेमाल करने लगेंगे और मूवीज डाउनलोड करने लगेंगे तो इतना बैंडविथ उपलब्ध ही नहीं है.

यह एक बड़ी समस्या है. पर ये अच्छी बात है कि इसको लेकर रिसर्च किए जा रहे हैं कि इतने ही स्पेक्ट्रम में कैसे बैंडविथ का पूरा इस्तेमाल हो सके, कैसे ज्यादा चैनल्स हो सके और ज्यादा लोग फोन पर बात कर सकें.

सभी को एक जैसी स्पीड मिले ?

Image caption इंटरनेट स्पीड को लेकर भारत में हर जगह एक जैसी स्थिति नहीं है.

ये एक मुश्किल चुनौती है. आप कहीं भी जाएं. यह समस्या अमरीका में भी है. पर अलग वजहों से.

वहां ऊंची इमारते हैं जिसकी वजह से वहां एक जैसी कवरेज नहीं है.

लेकिन इसके बावजूद वहां भारत से बेहतर स्पीड है. हमारे यहां एक जैसी स्पीड की समस्या है.

यह बहुत बड़ा देश है और यहां पर लगभग दस लाख के आस-पास मोबाइल टावर ही हैं जो पर्याप्त नहीं है.

इससे दो चीजें होती हैं. एक तो एक जैसी नेटवर्क कवरेज नहीं है. शहर में थ्री जी मिलेगा, शहर से बाहर निकलो तो वह टूजी हो जाएगा.

स्पीड पर दबाव

दूसरी बात यह कि शहर में अगर थ्री जी मिलेगा भी तो वहां इसका इस्तेमाल ज्यादा है और स्पीड पर लोगों का दबाव भी ज्यादा.

अगर आप किसी ट्राफिक जाम में फंसते हैं तो पाएंगे कि स्पीड बेहद कम हो गई है क्योंकि उस घड़ी कई लोग एक ही टावर से मिल रहे नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहे होते हैं.

अगर आप कहीं बाहर जाएं जहां थ्रीजी उपलब्ध है तो पाएंगे कि वहां स्पीड बेहतर है क्योंकि कम लोग इसका इस्तेमाल कर रहे होते हैं.

यह बहुत मुश्किल है कि अगले पांच सालों में भी सभी को एक जैसी इंटरनेट स्पीड हर जगह पर मिल पाएगी.

(बीबीसी संवाददाता नितिन श्रीवास्तव से बातचीत पर आधारित)

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए यहां क्लिक करें. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

संबंधित समाचार