हैदराबाद: दस साल में चार धमाके पर हुआ क्या?

  • 24 फरवरी 2013
हैदराबाद में धमाके
दिलसुख नगर पहले भी धमाके का निशाना बन चुका है

हैदराबाद के दिलसुख नगर इलाक़े में गुरूवार को हुए दोहरे बम धमाकों में 16 लोगों की जान चली गई और 120 से ज़्यादा घायल हुए.

ये हैदराबाद में बीते दस वर्षों में होने वाला पांचवां बड़ा चरमपंथी हमला था.

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, हैदराबाद पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि वो जल्द ही इन विस्फोटों के पीछे के षडयंत्र को बेनक़ाब कर देंगे और इनके लिए ज़िम्मेदार लोगों को सज़ा दिलाएंगें.

लेकिन अगर पिछली चरमपंथी घटनाओं की जांच के परिणामों पर नज़र डालें तो कम ही विश्वास होता है कि हैदराबाद की पुलिस ऐसा कर पाएगी.

पिछली घटनाओं के सिलसिले में अब तक किसी को सज़ा नहीं हुई है और न ही उनके लिए ज़िम्मेदार लोगों को पकड़ा जा सका है. उल्टा हैदराबाद की पुलिस निर्दोषों को पकड़ने या मार कर केस बंद कर देने के लिए विवादों में रही है.

आइए एक नज़र डालते हैं कि इससे पहले हुई चरमपंथी घटनाओं के बाद हुई जांच के क्या नतीजे रहे.

21 नवम्बर, 2002

दिलसुख नगर इलाक़े के साईं बाबा मंदिर के बहार शाम छह बजे के क़रीब एक स्कूटर में रखा बम फट गया जिससे दो लोग मारे गए.

सुरक्षा एजेंसियों की जांच पर कई सवाल उठते रहे हैं

पुलिस ने बड़े पैमाने पर तलाशी शुरू की और अगले दिन घोषणा कर दी कि पुलिस के साथ झड़प में एक 'चरमपंथी' मुहम्मद आज़म मारा गया. यह घटना हैदराबाद के क़रीब उप्पल में हुई.

दूसरे ही दिन पुलिस ने करीमनगर में एक और ‘चरमपंथी’ अब्दुल अज़ीज़ को मार गिराने का दावा किया. लेकिन दोनों हैदराबादी युवाओं के परिवारों ने दावा किया कि उन्हें घरों से पकड़ा गया और गोली मार दी गई.

वैसे भी उस समय आंध्रप्रदेश की पुलिस नक्सलवाद से लड़ाई के नाम पर लोगों को फ़र्ज़ी मुठभेड़ों में मारने के लिए पूरे देश में बदनाम थी. इस बम विस्फोट की छान बीन आज तक पूरी नहीं हुई और पुलिस का कहना है की इसकी साज़िश रचने वाले कई लोग अब तक लापता हैं.

12 अक्तूबर, 2005

हैदराबाद के इतिहास में पहली बार एक आत्मघाती हमला हुआ और उसका निशाना था बेगमपेट इलाक़े मे पुलिस टास्क फ़ोर्स का कार्यालय.

जिस समय पूरी पुलिस फ़ोर्स दशहरे के त्यौहार के अवसर पर सुरक्षा प्रबंधों में लगी थी, उसी समय एक चरमपंथी कार्यालय में घुस आया और उसने ख़ुद को विस्फोट से उड़ा दिया जिसमें एक पुलिस जवान की मौत हो गई जबकि अन्य बाल-बाल बचे.

पुलिस का दावा था कि यह चरमपंथी बांग्लादेश से आया था.

बाद में पुलिस ने इस घटना के सिलसिले में दो स्थानीय युवाओं अब्दुल ज़ाहिद और ग़ुलाम रब्बानी को गिरफ्तार कर लिया.

ग़ुलाम रब्बानी के भाई यज़दानी को दिल्ली में पुलिस ने मार्च 2006 में गोली मार दी. रब्बानी को बाद में रिहा कर दिया गया लेकिन ज़ाहिद अब भी जेल में है और यह मामला अभी भी अदालत में चल रहा है.

18 मई, 2007

जब जुमा के दिन नमाज़ के तुरंत बाद विस्फोट हुआ और उसमें कुल 16 लोगों की मौत हो गई तो कुछ ही मिनट के भीतर पुलिस ने यह घोषणा कर दी कि ये हरकतुल जिहाद-ए -इस्लामी या लश्कर-इ-तैयबा का काम है और उसके पीछे हैदराबाद के ही एक युवा अब्दुल शाहिद का हाथ है और वो पाकिस्तान में शरण लिए हुए है. इसी के साथ हैदराबाद में बडे पैमाने पर मुस्लिम युवाओं की पकड़ धकड़ शुरू हो गई.

लेकिन पुलिस की कथित ज़्यादतियों और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ बढ़ते विरोध के मद्देनज़र राज्य सरकार ने इस मामले की छानबीन सीबीआई के हवाले कर दी.

हैदराबाद धमाकों ने फिर चरमपंथ की समस्या को सुर्खियों में ला दिया है

इस बीच जिन स्थानीय युवाओं को गिरफ्तार कर उन पर ‘आतंकवाद’ से जुड़े मामले दर्ज किए गए थे, उन्हें अदालत ने निर्दोष पाकर बरी कर दिया. इनमें मोहम्मद कलीम, शोएब जागीरदार, इमरान, रईस और इब्राहिम जुनैद जैसे 26 लोग शामिल थे.

मक्का मस्जिद विस्फोट में हिन्दू चरमपंथी तत्वों के लिप्त होने का पहला संकेत नवंबर 2008 में उस समय मिला जब महाराष्ट्र पुलिस ने मालेगांव में विस्फोट के सिलसिले में ‘अभिनव भारत’ नाम के संगठन की साध्वी प्रज्ञा ठाकुर और कर्नल पुरोहित को गिरफ्तार किया और उनसे पूछ ताछ में यह बात सामने आई कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता सुनील जोशी मक्का मस्जिद में बम रखने वालों में शामिल थे.

लेकिन हैदराबाद पुलिस या सीबीआई ने उसे ज़्यादा गंभीरता से नहीं लिया. मामला ने उस समय तूल पकड़ा जब अप्रैल 2010 में राजस्थान की पुलिस ने अजमेर की दरगाह में विस्फोट के सिलसिले में संघ से संबंध रखने वाले दो लोगों देवेंद्र गुप्ता और लोकेश शर्मा को गिरफ्तार कर लिया. बाद में उन्हें पकड़कर हैदराबाद लाया गया जहाँ वो अब तक जेल में है.

इसके बाद की छान बीन के नतीजे में सीबीआई ने कई और कथित चरमपंथियों को गिरफ्तार किया जिनमें स्वामी असीमानंद, मुकेश वासनी, समुद्र चौधरी उर्फ़ राजिंदर, मुकेश वासानी, कमल चौहान, चंद्रशेखर लेवे शामिल हैं.

ऐसा माना जाता है कि सुनील जोशी को ख़ुद उनके साथियों ने ही इंदौर में गोली मार दी जबकि दो और अभियुक्त संदीप दंगे और रामचंद्र लापता हैं और उनकी तलाश जारी है. केंद्रीय गृह मंत्रालय का कहना है कि जो लोग पकड़े गए हैं, उनका किसी न किसी रूप में संघ से संबंध है और वो मालेगांव या समझौता एक्सप्रेस या अजमेर दरगाह में हुए विस्फोटों में भी लिप्त हैं.

अब तक इन पर मक्का मस्जिद विस्फोट का मामला अदालत में शुरू नहीं हो सका है.

27 अगस्त, 2007

शाम के लगभग सात बजे हैदराबाद के दो अलग-अलग भागों में स्थित लुम्बिनी पार्क और गोकुल चाट में दो शक्तिशाली बम फटे जिसमें 42 लोगों की मृत्य हो गई और पचास से ज़्यादा लोग घायल हो गए. उसी समय दिलसुख नगर में लगाए गए एक और बम का पता चला और उसे पुलिस ने नाकारा बना दिया.

दिलसुख नगर धमाके में कई लोगों ने अपनों को खोया है

इसके साथ हैदराबाद में एक बार फिर बड़े पैमाने पर लोगों की पकड़ धकड़ का सिलसिला शुरू हो गया. लेकिन एक बार फिर बाहर की पुलिस ने ही इस मामले को सुलझाया जबकि मुंबई की पुलिस ने 2009 में चार व्यक्तियों को गिरफ्तार करके हैदराबाद की पुलिस के हवाले किया.

उनमें शफ़ीक़ अनीक़ सैयद, अकबर इस्माइल चौधरी, अंसार अहमद शेख़ शामिल थे. इनसे पूछताछ में यह बात सामने आई कि यह विस्फोट कथित तौर पर रियाज़ भटकल के नेतृत्व वाले संगठन इंडियन मुजाहिदीन की कार्रवाई थी और इसका उद्देश मक्का मस्जिद में हुए विस्फोट और उसके बाद पुलिस फायरिंग में मुसलमानों की मौत का बदला लेना था. यह और बात है कि इस हमले में हिंदू और मुसलमान, दोनों ही मारे गए.

अभी भी इस मामले के चार अभियुक्त रियाज़ भटकल उर्फ़ रोशन ख़ान, इक़बाल भटकल उर्फ़ मुहम्मद भाई, फ़ारूक़ शरफ़ुद्दीन तरकश, मुहम्मद सादिक़ अंसार अहमद शेख़ और आमिर रज़ा ख़ान मुत्तकी लापता बताए जाते हैं.

हालांकि गिरफ्तार किए गए लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस 2010 में अदालत में तीन अभियोग पत्र दाख़िल कर चुकी है लेकिन अभी यह मामला अदालत में चल रहा है और किसी को सज़ा नहीं हुई है.

अब पुलिस ताज़ा विस्फोटों के सिलसिले में भी इंडियन मुजाहिदीन पर ही संदेह व्यक्त कर रही है, हालाकि अभी तक आधिकारिक तौर पर पुलिस ने कुछ नहीं कहा है.

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