तालिबान को चुनौती देती अफ़गानिस्तान की 'मलाला'

  • 22 फरवरी 2013
मलिना
Image caption दीवार पर चित्रकारी करती अफ़गानिस्तान से आई मलीना

नवोदित ग्राफिती चित्रकार मलीना सुलेमान दिखने में जितनी सुंदर हैं, अंदर से उतनी ही निडर भी हैं.

अफ़ग़ानिस्तान के कंधार शहर से आई मलीना विदेशी ज़रूर हैं लेकिन मुंबई के प्रसिद्ध जेजे स्कूल ऑफ़ फाइन आर्ट्स में पढ़ाई करते हुए वे खुद को विदेशी बिल्कुल नहीं समझतीं.

मलीना अपने देश की उदार और आधुनिक विचारधारा रखने वालों की बढ़ती हुई आबादी का एक हिस्सा हैं.

हालांकि तालिबान से मुक़ाबला करना आसान नहीं है लेकिन उन्होंने काफी हद तक ये भी किया, लेकिन जब तालिबान की धमकियाँ बढती गईं और उनके पिता की टांग तोड़ दी गई तब उन्होंने अपना देश छोड़ दिया.

दो महीने पहले अपने माता-पिता के साथ कंधार से मुंबई आईं मलीना यहाँ की 'खुली फ़िज़ा में आज़ादी से सांस ले रही हैं' और जब से वो यहाँ आई हैं तब से काफी खुश हैं.

जेजे स्कूल में वो कला की पढ़ाई कर रही हैं.

अपराध

मलीना सुलेमान का 'अपराध' केवल ये था कि वो शहर की दीवारों और चट्टानों पर चित्रकला का प्रदर्शन किया करती थीं और हाँ इसके अलावा वे मूर्तिकला में भी माहिर थीं.

ज़ाहिर है तालिबान को उनकी कला में दिलचस्पी पसंद नहीं आई.

वे कहती हैं, "तालिबान ने हमें इंसानों की मूर्तियाँ और पेटिंग से मना किया क्योंकि उनके अनुसार ये ग़ैर इस्लामी है. पहले हमने हार नहीं मानी और अपनी कला का प्रदर्शन करते रहे लेकिन फिर उन्होंने मेरे पिता पर हमला किया और उनकी टांग तोड़ दी तो हमें वहां से फरार होना पड़ा."

आठ भाई और बहनों में सब से छोटी मलीना को कला से बचपन से ही लगाव था. कला की पढ़ाई करने वो कराची भी गईं और बाद में अपने देश लौट कर इसके महत्त्व का प्रचार करने लगीं, लेकिन शुरू से ही उनको विरोध का सामना करना पड़ा.

मलीना के अनुसार, "मैं दीवारों और चट्टानों पर पेंटिंग करती तो लोग बुरा-भला कहते और पत्थर फेंकते थे. हम दूसरी जगह जाते वो वहाँ भी चले आते. ये सिलसिला काफी दिनों तक चलता रहा."

शुरू के दिनों में मलीना के माता पिता को इसके बारे में मालूम नहीं था, लेकिन एक दिन जब तालिबान की लिखित रूप से धमकी आई तो उनके परिवार वालों ने उन्हें घर में क़ैद कर दिया.

वो ग्राफिती का काम दोबारा शुरु करने के लिए मचलने लगीं.

मलीना के अनुसार, "मैं डेढ़ साल तक घर में क़ैद रही, मेरे सीने में एक तूफ़ान उमड़ रहा था. मैं लोगों से मिलना चाहती थी. घर पर इंटरनेट भी नहीं था. घर के इस क़ैद में मुझे समझ में आया कि हमारी तरह देश में और भी लड़कियां होंगी जो अपनी कला को सामने लाना चाहती होंगी लेकिन उनके घर वालों ने उन्हें रोक दिया होगा ऐसे में मैंने अपने परिवार से बग़ावत कर दी."

मलीना के मुताबिक, "मैंने पेंटिंग के बजाये ग्राफिती को इसलिए चुना क्योंकि ये काम दीवारों पर होता है जिसे अधिक से अधिक लोग देख सकते हैं."

महिलाओं की आज़ादी

मलीना का मक़सद महिलाओं और अन्य कलाकारों की आज़ादी और उनकी तरह सभी लड़कियों को पैग़ाम देना कि उन्हें डरने की ज़रुरत नहीं है.

ग्राफिती चित्रकला का बीड़ा उठाने का मकसद अपने परिवार, रूढ़िवादी समाज और तालिबान के खिलाफ़ बग़ावत भी था. उन्हें उनके इस साहस के लिए खुद राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने अपने महल बुलाकर शाबाशी भी दी थी, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सरकार से शिकायत है.

सरकार मर्द और औरत के बीच बराबरी की सिर्फ बातें करती है, बराबरी पर अमल नहीं करती.

मलीना मुसलमान औरतों और कलाकारों के लिए आज़ादी चाहती हैं. वे कहती हैं कि आज़ादी पश्चिमी देशों वाली नहीं लेकिन इस्लाम के दायरे में रह कर भी हमें काफी आज़ादी मिल सकती है.

Image caption मलीना भारत में लड़के और लड़कियों के बीच दोस्ताना रिश्ते से काफी प्रभावित है

उन्हें अफ़सोस इस बात का है कि कंधार में मुस्लिम समाज तालिबान की सोच को तेज़ी से अपनाने लगा है. वे कहती हैं, "हम ये नहीं कह सकते कि कंधार में सभी तालिबान हैं लेकिन हम ये कह सकते हैं की सभी तालिबानी विचार रखते हैं."

वो भारत के समाज की प्रशंसा करती नहीं थकतीं. उन्हें मुंबई में लड़के और लड़कियों के बीच करीबी दोस्ती देख कर शुरू में झटका लगा.

मलीना के अनुसार, "यहाँ जिस तरह लड़के और लड़कियां आपस में काम करते हैं और इतने करीब हो कर भी केवल दोस्त रह सकते हैं वो हमें अच्छा लगता है."

वो कहती हैं अगर उनके पास विकल्प हो तो वे मुंबई में कुछ और समय बिताना चाहेंगीं.

उनके मुताबिक, "इस समय मैं कशमकश में हूँ. एक तरफ मेरे परिवार के बंधन हैं और दूसरी तरफ तालिबान की धमकियाँ, मैं कहाँ जाऊं? मेरा भविष्य क्या है मुझे नहीं मालूम."

लेकिन अनिश्चित भविष्य के बावजूद उनके चेहरे पर न कोई शिकन है और न ही मायूसी का एहसास.

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