चाय बागानों में मशीनों का बढ़ता दबदबा

 सोमवार, 3 दिसंबर, 2012 को 03:03 IST तक के समाचार
चाय बागान

मशीनों से चाय की पत्तियों के साथ डंठल कटने का भी डर रहता है.

उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्य असम चाय उत्पादन के लिए दुनिया भर में जाना जाता है और चाय ही इस राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है.

चाय उत्पादन में इस्तेमाल होने वाली पुरानी परंपराएं मसलन हाथ से पत्तियों को तोड़ना, ये सब इसे काफी खर्चीला बना देती हैं.

लेकिन इसकी गुणवत्ता से कोई भी छेड़-छाड़ विश्व प्रसिद्ध असम ब्रांड को नुकसान भी पहुंचा सकती है.

मैं असम के एक चाय बागान में बने ब्रिटिश राज के एक बंगले में एक रात ठहरा हुआ था. जब सुबह के छह बजे मुझे साइरन की आवाज सुनाई दी.

बाग़ान में काम करने वाले हज़ारों से भी ज्यादा पुरुषों और महिलाओं के लिए ये सायरन उनके दिन की शुरूआत है कि दिन के आठ घंटे के काम का वक़्त शुरू हो गया है.

इसके दौरान पत्तियों को तोड़ने, चाय के नए पौधे रोपने, खर-पतवार साफ करने या फिर ऐसे कई काम वो करते हैं, वो सब जो कि उच्च गुणवत्ता वाली चाय की पत्ती तैयार करने के लिए जरूरी हैं.

सायरन की आवाज सुनकर बागानों के मालिक भी जगते थे जो लोगों को उनकी अलग-अलग ड्यूटी पर लगाते हैं.

प्रबंधन

असम के चाय बागान एक बड़े से बिलियर्ड मेज के कपड़े सरीखे लगते हैं. दूर-दूर तक हरे-भरे चाय के पेड़ और नियमित रूप से उन्हें तोड़ने के बाद तो ऐसा लगता है जैसे उन्हें चपटा बनाया गया है.

जिस चाय बागान में मैं रुका था, उसका प्रबंधन बिल्कुल सेना की तरह से होता था. बिल्कुल वैसा ही जैसा ब्रिटिश राज में मेरे निरंकुश चाचा चाय बागान का प्रबंधन देखते थे.

सुबह की बैठक में मौजूद रहने वाले लोग अधिकारी वर्ग से होते हैं. वे अभी भी परंपरागत कपड़े ही पहनते हैं - जैसे हाफ पैंट और लंब मोजे.

सीनियर मैनेजर कमान अधिकारी होता है. वो बँगले में रहता है और बँगले की भव्यता ही उसके अधिकार का प्रतीक है.

"यह रेजीमेंटल व्यवस्था ब्रिटिश दौर में कारगर रही थी, और मैने बागान में काम करने के 50 सालों के दौरान पाया है कि ये यहां की व्यवस्था के लिए काम कर रही है."

देवराज, चाय बागान के सुपरवाइजर

अधिकारियों का मेस स्थानीय चाय उत्पादकों का क्लब है. इसकी स्थापना ब्रितानी राज के दौर में हुई थी.

उधर घूमने पर सैनिकों की तरह मूंछे रखे देवराज से बातचीत का मौका मिला. फौज के किसी अधिकारी से दिखने वाले देवराज कंपनी में सलाहकार है.

वो बताते हैं, “यह रेजीमेंटल व्यवस्था ब्रिटिश दौर में कारगर रही थी, और मैने बागान में काम करने के 50 सालों के दौरान पाया है कि ये यहां की व्यवस्था के लिए काम कर रही है.”

मज़दूरों की खोज

बाग़ान की रक्षा का ज़िम्मा संभालने वाले और श्रमिक दोनों ही चाय बागानों के जिस इलाक़े में रहते हैं जिन्हें “लेबर लाइन्स” पुकारा जाता है.

शुरू में ब्रिटिश चाय बागान के मालिकों को स्थानीय स्तर पर श्रमिक बहुत मुश्किल से मिलते थे, इसलिए ठेकेदारों ने भारत के दुसरे हिस्सों से न सिर्फ पुरुषों बल्कि महिलाओं और बच्चों को भी जमा कर नाव के ज़रिए यहां भेजना शुरू कर दिया.

ये यात्रा इतनी दुर्गम होती थी कि बहुत से लोग तो रास्तों में ही दम तोड़ देते थे. आज के समय में जो श्रमिक दिखते हैं वो उन्हीं लोगों के वंशज हैं जो उन यात्राओं में किसी तरह से बच गए थे.

देवराज बताते हैं कि श्रमिकों के देखभाल पूरी तरह से की जाती है. उन्हें न सिर्फ सरकारी दरों पर तय मजदूरी मिलती है बल्कि उन्हें मुफ्त राशन, लकड़ी और बिजली सप्लाई की भी व्यवस्था है. बागान के भीतर स्कूल और अस्पताल भी मौजूद हैं.

'... डंठल और पत्ती में फर्क नहीं'

हालांकि पुराने ढंग से जिसमें मज़दूरों के हर ज़रूरतों की देखभाल की जाती थी फसल की लागत बढ़जाती है. लेकिन देवराज इस प्रक्रिया का मशीनीकरण करके श्रमिकों की संख्या घटाने का विरोध करते हैं.

महिलाओं को झुककर चमकीली पत्तियां तोड़ते देखकर वो कहते हैं कि मशीन डंठल और पत्ती में फर्क नहीं कर सकती. वो कहते हैं, “मशीन से आपको पत्तियों और डंठलों का मिश्रण मिलेगा जिससे कि अच्छी चाय नहीं बन सकती.”

चाय बागान

चाय की पत्तियों को तोड़ने के बाद उन्हें प्रॉसेसिंग के लिए भेजा जाता है.

लेकिन आज कुछ बागानों को मशीनीकरण के लिए विवश होना पड़ा है, जिनमें वो भी शामिल है जिसकी निगरानी देवराज करते हैं. इसकी मुख्य वजह लोगों की कमी बताई जा रही है.

देवराज कहते हैं, ”नौजवान लोग बताते हैं कि हो सकता है कि वो एक कुली के रूप में पैदा हुए हों, लेकिन फिलहाल वो अपने बाकी बचे जीवन में ये कहलाने के लिए तैयार नहीं हैं.”

बहरहाल, एक अन्य बागान में मुझे श्रमिकों ने बताया कि हाल ही में आई नई सरकारी योजना के चलते बागान श्रमिकों का आकर्षण बढ़ा है. जब मैंने इसकी वजह पूछी तो मुझे बताया गया, “इस योजना में आपसे उम्मीद की जाती है कि आप काम करेंगे, लेकिन इस बात को सुनिश्चित करने वाला कोई नहीं है कि आप ये काम करो. यहां वो हर समय आप पर निगरानी रखते हैं.”

कम होता निर्यात

इसके अलावा छोटे बागान मालिकों की लगातातर बढ़ती संख्या भी असम चाय की गुणवत्ता पर संकट की वजह है. छोटे बागान मालिक अपनी कीमत कम रख सकते हैं क्योंकि उनकी लागत कम आती है. लेकिन समस्या ये है कि वो अपनी गुणवत्ता से समझौता कर लेते हैं.

ऐसे भी कई बागान हैं जो अपनी गुणवत्ता कायम रखना नहीं चाहते. देव राज बताते हैं कि चाय का कोई भी पौधा चालीस साल से पुराना नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे पत्तियों की गुणवत्ता प्रभावित होती है.

लेकिन पौधों का दोबारा रोपण और भी मुश्किल और महँगा है. इसलिए कई मालिक पुराने पौधों से ही काम चला रहे हैं.

खराब गुणवत्ता वाली चाय असम चाय की ब्रांड वैल्यू को प्रभावित करती हैं क्योंकि इन पत्तियों की तुलना कीनिया और वियतनाम की पत्तियों से की जाती है, जहां उत्पादन मूल्य काफी कम है.

इसलिए ब्रांड वैल्यू को बनाए रखना भारतीय चाय के निर्यात के लिए घातक साबित हो रहा है जो कि पिछले पांच सालों में 12 प्रतिशत तक कम हुआ है.

देव राज कहते हैं, “यदि आप चाय बागान का प्रबंधन करते हैं तभी चाय की गुणवत्ता को बचाए रखा जा सकता है, क्योंकि मैं पचास साल से इन पत्तियों के प्रबंधन को देख रहा हूं.”

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