फ़िल्म रिव्यू: औरंगज़ेब

  • 17 मई 2013
औरंगज़ेब

यशराज बैनर की फ़िल्म औरंगज़ेब कहानी है ताकत, भ्रष्टाचार, धोखेबाज़ी और अपराध की.

आर्य फ़ोगट (पृथ्वीराज सुकुमारन) एक पुलिस अफ़सर है. उसे बचपन से उसके अंकल डीसीपी रविकांत फ़ोगट (ऋषि कपूर) ने पाला है.

उसके पिता विजयकांत फोगट (अनुपम खेर) भी एक पुलिस अफ़सर थे, लेकिन वो एक अपराधी यशवर्धन सिंह (जैकी श्रॉफ़) को वो गिरफ़्तार करना चाहते थे. सबूतों के अभाव में वो ऐसा नहीं कर पाते.

(देखिए साशा आगा की तस्वीरें)

अर्जुन कपूर अपने डबल रोल के साथ न्याय नहीं कर पाए हैं. साशा आगा की फिल्मों में बड़ी ढीली शुरुआत रही.

यशवर्धन की पत्नी वीरा (तन्वी आज़मी) उससे तंग आकर पुलिस की मुखबिर बन जाती है और एक दिन अपने जुड़वां बच्चों में से एक को लेकर घर से भाग जाती है.

सालों बाद आर्य को पता चलता है कि दरअसल वीरा ने उसके पिता विजयकांत से शादी कर ली है. और उसका बेटा विशाल (अर्जुन कपूर) भी विजयकांत की देख रेख मे बड़ा होता है.

विशाल की शक्ल अपने जुडवां भाई अजय (अर्जुन कपूर) से हूबहू मिलती है जो अपने पिता यशवर्धन सिंह के साथ रहता है.

(गो गोवा गॉन की समीक्षा)

तब डीसीपी रविकांत फो़गट, जो ख़ुद एक भ्रष्ट पुलिस अधिकारी है वो एक षडयंत्र रचता है. क्या है वो षडयंत्र. विशाल और अजय की इसमें क्या भूमिका है. और रविकांत फोगट (ऋषि कपूर) के क्या इरादे हैं.

आर्य फोगट इसमें किसका साथ देता है. अपने चाचा का, यशवर्धन का या फिर विशाल और अजय का. यही फिल्म की कहानी है.

स्क्रीनप्ले

ऋषि कपूर ने भ्रष्ट पुलिस अधिकारी की भूमिका अच्छे से निभाई है. पृथ्वीराज ने भी ईमानदारी से अपना रोल निभाया है.

अतुल सभरवाल की कहानी और स्क्रीनप्ले इतना खिंचा और उलझा हुआ है कि दर्शकों को समझ में ही नहीं आता कि पर्दे पर क्या चल रहा है.

जुड़वां भाइयों की कहानी होने के अलावा फिल्म में इतने सारे फिज़ूल के मोड़ हैं जो कहानी को पकाऊ बना देते हैं. और दर्शकों को उन्हें पचाने में दिक्कत होगी.

(कैसी है बॉम्बे टॉकीज़)

कहानी का हर किरदार एक दूसरे के साथ साज़िश कर रहा होता है और कहानी में इतनी उलझन देखकर दर्शकों का दिमाग ही चकरा जाएगा.

विशाल, अजय की जगह ले लेता है. आर्य, अजय और विशाल दोनों से नफ़रत करता है. अजय और विशाल आर्य से नफ़रत करते हैं. अजय, विशाल से नफ़रत करता है. ये सब बातें समझते समझते सर में दर्द होने लगता है.

अतुल सभरवाल के लिखे संवाद में ज़बरदस्ती अच्छी भाषा के सहारे प्रभावित करने की कोशिश की गई है.

इसके अलावा संवाद काफ़ी लंबे लंबे भी हैं जो लोगों को बोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ते.

अभिनय

फ़िल्म की कहानी काफ़ी उलझी हुई है जो दर्शकों को बोर कर देती है.

अर्जुन कपूर ने फिल्म में बुरे चरित्र वाला किरदार अच्छे से निभाया है लेकिन यही बात उनके दूसरे रोल के बारे में नहीं कही जा सकती.

वो विशाल और अजय के किरदार में अपने आपको इतनी अच्छी तरह से नहीं ढाल पाए हैं इस वजह से दर्शकों को लगता ही नहीं कि वो दो अलग-अलग किरदारों को देख रहे हैं.

साशा आग़ा फिल्म की हीरोइन हैं और ये उनकी पहली फिल्म है. ये उनकी फिल्मी पारी की बेहद कमज़ोर शुरुआत है. वो बेहद साधारण दिखती हैं और उनके अभिनय में बेहद सुधार की गुंजाइश है.

ऋषि कपूर ने अपना रोल ठीक तरह से निभाया है लेकिन ऐसा लगा जैसे वो फिल्म में ज़्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं.

जैकी श्रॉफ, यशवर्धन सिंह के अपने किरदार में कुछ नया नहीं जोड़ पाए हैं.

पृथ्वीराज ने अपना किरदार पूरी गंभीरता और ईमानदारी से निभाया है.

अमृता सिंह ने छोटा सा रोल अच्छे से निभाया है. दीप्ति नवल जैसी टैलेंटेड अभिनेत्री को फिल्म में ज़ाया कर दिया गया है.

तन्वी आज़मी और स्वरा भास्कर ने अच्छा काम किया है.

निर्देशन

अतुल सभरवाल ने अपनी पहली फिल्म में इतनी कठिन कहानी चुन ली जिसे वो संभाल ही नहीं पाए. अमर्त्य राउत और विपिन मिश्रा का संगीत बेहद निराशाजनक है.

फिल्म की एडिटिंग भी कमज़ोर है.

कुल मिलाकर ‘औरंगज़ेब’ में कमर्शियल फिल्म के लिए ज़रूरी मसाला ही नहीं है. फिल्म में मनोरंजन का पुट ही नहीं है.

फिल्म के बॉक्स ऑफ़िस पर चलने की संभावना बेहद कम है.

मल्टीप्लेक्स में इसका व्यवसाय सामान्य से कम रहेगा जबकि सिंगल स्क्रीन थिएटर में ये फिल्म साधारण बिज़नेस ही कर पाएगी.

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