काय पो छे : दोस्ती की दास्तां पसंद आएगी दर्शकों को?

  • 22 फरवरी 2013
काय पो छे, हिंदी फिल्म

'काय पो छे' ये कहानी है तीन दोस्तों की, गोविंद (राज कुमार यादव), ईशान (सुशांत सिंह राजपूत) और ओमी (अमित साध) जो अहमदाबाद में रहते हैं.

गोविंद रोज़ी रोटी के लिए ट्यूशन देता है और ईशान एक शानदार क्रिकेटर है जो कुछ भी नहीं करता.

चेतन भगत और 100 करोड़ की शर्त

तीनों दोस्त एक खेल अकादमी शुरु करने के बारे में सोचते हैं. ईशान की मां (मुन्नी झा) पैसों की मदद करने से मना कर देती है तो ओमी के मामा बिट्टू (मानव कौल) मदद के लिए आगे बढ़ते हैं.

बिट्टू एक नेता हैं और चाहते हैं कि ओमी भी राजनीति में दाखिल हो जाए. वहीं दूसरी और ईशान को अली (मास्टर दिग्विजय देशमुख) में एक अच्छे क्रिकेटर की संभावनाएं नज़र आती है.

अली के पिता नसीर हाशमी (आसिफ बसरा) है जो बिट्टू के कट्टर प्रतिद्वंदी है. ईशान, अली को ट्रेनिंग देना शुरु करता है ताकि वो रणजी ट्रॉफी के लिए तैयार हो सके.

उधर गोविंद और ईशान के लिए अपनी खेल की दुकान चलाना मुश्किल हो जाता है. ओमी अपने मामा के साथ चुनावों में व्यस्त हो जाता है और ईशान की बहन विद्या (अमृता पुरी) गोविंद के करीब आ जाती है.

इस बीच गोधरा कांड के बाद अहमदाबाद में दंगे भड़क जाते हैं जिसमें ओमी अपने माता-पिता को खो देता है जिसे सांप्रदायिक रुप देकर बिट्टू अपने आदमियों को उपद्रव के लिए उकसाता है.

Image caption अभिषेक कपूर का निर्देशक बेहद ही सहज है.

इस तनाव भरे माहौल में ईशान को सुनिश्चित करना होता है कि अल्पसंख्यक संप्रदाय से ताल्लुक रखने वाले अली का चयन क्रिकेट के लिए हो जाए.

क्या अली चयन-स्थल तक पहुंच पाएगा? क्या ईशान का अली को अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में देखने का सपना पूरा हो पाएगा? तीनों दोस्तों के खेल अकादमी के सपने का क्या होगा?

पहला भाग रोचक

कहानी चेतन भगत के उपन्यास 'द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माय लाईफ' पर आधारित है. स्क्रीन रुपांतरण पुबाली चौधरी,सुप्रातिक सेन,अभिषेक कपूर और चेतन भगत ने किया है.

फिल्म का पहला भाग बहुत रोचक है ख़ासतौर पर तीनों लड़कों की दोस्ती और अली की ट्रेनिंग. लेकिन इंटरवेल के बाद दर्शक की उम्मीद पर पानी फिरता नज़र आता है.

इंतज़ार रहता है कि अली का क्या होगा,क्या इस सांप्रदायिक दंगों के बीच वो चयन स्थल तक पहुंच भी पाएगा लेकिन गोधरा कांड के दुष्परिणामों ने फिल्म के दूसरे हिस्से को घेर कर रखा. जो फिल्म की पृष्ठभूमि थी वो बाद में मुख्य कहानी बन जाती है.

ऐसा नहीं है कि इंटरवेल के बाद ड्रामा नहीं था लेकिन जिस तरह के भावुक क्षणों की उम्मीद की जा रही थी वो देखने को नहीं मिले.

यहां ये कहना भी ज़रुरी है कि शायद कुछ बड़े शहर के दर्शकों को फिल्म में यथार्थ के करीब दिखाए गए दृश्य पसंद आए लेकिन निराशा उन्हें लगेगी जो किसी काल्पनिक ड्रामा की अपेक्षा किए हुए थे.

शानदार अभिनय

Image caption काय पो छे के तीनों अभिनेताओं ने काबिले-तारीफ काम किया है.

चार पटकथा लेखकों द्वारा लिखे गए संवाद और रचा गया माहौल दोनों ही सहज थे.

राजकुमार यादव ने गोविंद का रोल बहुत बेहतरीन तरीके से निभाया. स्क्रीन पर यादव को देखना काफी आनंददायक था जिसके लिए उन्हें पुरस्कार मिलना चाहिए.

सुशांत सिंह राजपूत ने बड़े पर्दे पर काफी अच्छी शुरुआत की है. उन्हें देखकर लगता नहीं कि वो अभिनय कर रहे हैं. अमित ने भी ओमी का रोल एकदम सही पकड़ा. विद्या,मानव कौल और मास्टर दिग्विजय देशमुख अपने रोल में काफी प्रभावी लगे हैं.

अभिषेक कपूर का निर्देशन शानदार है. उन्होंने फिल्म में एक वास्तविक माहौल खड़ा किया, अपने अभिनेताओं से बहुत अच्छा काम करवाया और कहानी को काफी नए और रोचक ढंग से पेश किया. लेकिन ऐसा लगता है कि मध्यांतर के बाद रिश्तों की ये कहानी एक सीमित वर्ग को ही छू पाएगी.

अमित त्रिवेदी का संगीत बहुत अच्छा है और स्वानंद किरकिरे के बोल एकदम अद्भुत. हितेश सोनिक का बैकग्राउंड स्कोर काफी तगड़ा है जिसका असर फिल्म ख़त्म होने के बाद भी रहेगा.

कुल मिलाकर काय पो छे एक बेहद खूबसूरत और अच्छे अभिनय से सराबोर फिल्म है लेकिन फिल्म का दूसरा हिस्सा शायद इसकी पहुंच को सीमित कर दे.

फिल्म में गुजराती कलेवर होने के कारण इसके गुजरात में चलने की पूरी संभावनाएं है. लेकिन फिल्म का गुजराती शीर्षक और बड़े सितारों की ग़ैर मौजूदगी शायद फिल्म के लिए घातक साबित हो.

संबंधित समाचार